Skip to main content

Posts

हिरन और उसका जंगल

           उन्नीस्वी सदी के इंग्लैंड में जब सामुदायिक जमीनों पर बाड़ा बंदी हो रही थी और उन्हें निजी स्वामित्व में सौंपा जा रहा था, उस वक़्त, इंग्लैंड के लोककवियों  ने कॉमन्स पर कई गीत रचे।  "The Goose and the Common" ऐसी ही एक कालजयी रचना है।   कबीर के  दोहों की तरह इस कविता पर भी सबका हक़ है।              The Goose and the Common The law locks up the man or woman.                                                                               Who steals the goose from off the common But leaves the greater villain loose Who steals the common from the goose. The law demands that we atone When we take things we do not own But leaves the lords and ladies fine Who take things that are yours and mine. The p...
Recent posts

क्या लोगों की भागीदारी से सच में सोच बदलती है?

  एक गाँव के छोटे से प्रयोग ने क्या दिखाया** (ध्वनि, धीरेश, सुहास, कीर्तन, राजेश, उमेश, रामकुमार और FES की बिछिया टीम को 2019 में किये इस प्रयोग के लिए आभार) विकास की दुनिया में “भागीदारी” शब्द बहुत चलता है। हर संस्था कहती है कि वे लोगों को साथ लेकर काम करती हैं । लेकिन क्या सच में लोगों की भागीदारी से उनकी सोच और हालात बदलते हैं? या यह बस एक औपचारिक तरीका बन गया है, जिसमें असली समस्याएँ वही की वही रहती हैं? इस सवाल को समझने के लिए दो बड़े विचारकों को याद करना जरूरी है—गांधी और पाउलो फ्रेरे। गांधी ने ऐसे समाज की कल्पना की थी जहाँ लोग खुद अपने फैसले लें। उन्होंने इस तरह भागीदारी के "क्या" का उत्तर देने का प्रयास किया। जबकि फ्रेरे ने बताया कि यह "कैसे" होगा—बातचीत करके साथ में सीखने  से, मुद्दों की पैनी समझ बढ़ाने से और सही सवाल पूछने से जिससे शोषक  व्यवस्था  में सुधार किया जा सके । ये दोनों मिलकर बताते हैं कि असली भागीदारी सिर्फ बैठकों में लोगों को बुलाने से ज्यादा है। यह लोगों को यह समझने का मौका देती है कि उनके जीवन पर कौन-सी ताकतें असर डाल रही हैं। पाउलो फ्रेरे...

Do Participatory Approaches Spark Critical Consciousness? Inside a Village Experiment That Reveals What Development Often Misses**

  (Acknowledgements: Dhwani Lalai, Keertan Baghel, Ramkumar, Dheeresh, Umesh and Rajesh of Foundation for Ecological Security in 2019-20) For decades, “participation” has been one of the most overused—and least understood—words in development. From large donor programmes to grassroots NGOs, everyone claims to involve the community. But does participation really empower people? Or has it become a comfortable ritual that leaves deeper structures untouched? Mahatma Gandhi: Google images Paulo Friere: from shutterstock To answer this, it helps to return to two thinkers who shaped the idea long before it became a development buzzword. Mahatma Gandhi imagined the what of a true democracy—self-governed, self-reliant communities shaping their own futures. Paulo Freire offered the how —dialogue, critical awareness and the courage to question oppression. When put together, they point toward a participatory approach that is not just about including people in projects, but about enabling t...

प्रेम की राजनीति

इस आलेख की विषयवस्तु 2011 में बनी हॉलीवुड फिल्म "पॉलिटिक्स ऑफ़ लव" नहीं है जिसकी कहानी एक डेमोक्रेट पार्टी समर्थक और एक रिपब्लिकन पार्टी समर्थक पुरुष और स्त्री के बीच प्रेम की गुंजाइश को तलाशती महसूस होती है।  मालूम हो कि भारतीय अभिनेत्री मल्लिका शेरावत ने उसमें एक अहम् किरदार निभाया था। मैं मई 2023 में मृणाल पण्डे जी के द वायर में छपे " Why We Need to Embrace a Politics of Love" नामक लेख के बारे में भी बात नहीं कर रहा जिसमें उन्होंने राहुल गाँधी द्वारा प्रधानमंत्री को संसद में गले लगाने के उपक्रम पर टिपण्णी की थी।  ये विचार जो मैं यहाँ बांटना चाहता हूँ वो हमारे चारों ओर बढ़ती हिंसा और उसके मेरे और मेरे आसपास के लोगों के  अंतर्मन पर लगातार पड़ने वाले असर का परिणाम है।  कोई दिन ऐसा बीतता नहीं जब कोई ऐसी बात न होती हो जिससे मन में तेज़ नफरत न फूटती हो।  पर क्या करें। कुछ न कर पाने की विवशता से निकला हुआ लेख है ये। एक व्यथित मन की किंकर्तव्यविमूढ़ता का अपराधबोध।   मुझे यकीन है कि जो मैं लिख रहा हूँ वह कोई मौलिक विचार नहीं है। मुझे तो अम्बेडकर के प्रसिद्द लेख ...

जनवादी मीडिया और डिजिटल प्रयोग

फोटो फ्रीडम हाउस वेबसाइट से साभार    कुछ महीने पहले मैंने वैकल्पिक मीडिया पर एक लेख लिखा था। इसमें  मीडिया की मुख्यधारा से अलग गए कुछ पत्रकारों और संस्थानों के प्रयासों को रेखांकित करते हुए इन प्रयासों की समीक्षा करने की कोशिश की थी। हाल ही में NDTV  के अधिग्रहण के बाद रविश कुमार के यूट्यूब चैनल पर भारी दर्शकों की भीड़ ने वैकल्पिक मीडिया की ताक़त को रेखांकित किया है। मगर इस बार मैंने कोशिश की है कि जनवादी मीडिया के डिजिटल प्रयोगों की कुछ समीक्षा की जाए जोकि ऐसे लोगों की कमान में है जिनका जन-आंदोलनों से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है।जनवादी मीडिया आमतौर पर डिजिटल मीडिया के पेशेवर स्वरुप के मुक़ाबले कहीं अधिक मुश्किल में अपना काम कर रहा है। घोर संसाधनों का अभाव के बावजूद जनवादी मीडिया पूरी कोशिश करता है जन-साधारण के पक्ष में कुछ हवा बनाने की। हालाँकि आम तौर पर पाठकों तक पहुंचना जनवादी मीडिया के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है खासतौर पर जब डिजिटल युग में इतनी सारी सामग्री हमारे सब तरफ मौजूद है।  जनवादी मीडिया के कई उदाहरण हैं।  जैसे बहुजनवादी विमर्श को प्रोत्साहित करती "फॉर...