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दो पुरानी कविताएं

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सत्य (2-5-2005 )


सत्य
न जाने कैसे
कब

इतना जटिल हो गया

कि व्यक्त करने को
कम पड़ गयीं भाषाएं

अंकित करने को
कम पड़ गए रंग

न जाने कैसे
कब

जुबान पर रखा
जलता कोयला हो गया सत्य।

सन 2050 (26-12-2003)

पिछले सौ-सवा सौ सालों में
हमने जो तरक्की की
उसके लिए आप जिम्मेदार हैं
पर इस तरक्की के साथ जीना
आप हमें नहीं सीखा पाए

इसलिए
हालाँकि आप इसके लायक तो नहीं
पर फिर भी
हम आप पर दया करते हैं


लैंटाना के डॉक्टर- (डॉ भरत सुंदरम के साथ बातचीत के कुछ अंश)

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साथियों, डॉ भरत सुंदरम देश के गिने चुने इकोलॉजी विशेषज्ञों में से हैं जिन्होंने आक्रामक झाड़ियों (invasive shrubs ) पर गंभीर शोध किया है। पिछले लगभग 20 वर्षों से वह लैंटाना पर शोध कर रहे हैं। वर्तमान में वह krea University, चेन्नई में पढ़ाते हैं। उनके मंडला आगमन पर हमें उनसे बातचीत का सौभाग्य मिला। उनसे बातचीत के कुछ अंश यहाँ हम आपसे बाँट रहे हैं। यूँ तो इस बातचीत को हमने रिकॉर्ड किया था। पर वह इतनी लम्बी हो गयी के अब हम उसे पूरा आपके साथ नहीं बाँट पा रहे। इसके लिए हम आपसे  क्षमाप्रार्थी हैं।

तो पेश हैं उनसे बातचीत के कुछ अंश

मैं कबीर- डॉ भरत हमें थोड़ा बताइये के आप की रूचि सोशल इकोलॉजिकल सिस्टम्स में कैसे आयी जबकि आपने अपना करियर तो  एक species विशेषज्ञ के रूप में शुरू किया था। आपने ये बदलाव अपने कॅरियर में क्यों लाया। 

मैं शुरुआत में तो wildlife biology में पढाई करना चाहता था। बाद में पता लगा कि इकोलॉजी में ही वाइल्डलाइफ बायोलॉजी पढ़ सकते हैं। मुझे लगा कि इकोलॉजी पढ़ने से मेरा worldview बेहतर होगा।  तो पॉन्डिचेरी यूनिवर्सिटी से इकोलॉजी में पोस्ट-ग्रेजुएशन किया। वहां अपने dissertation के …

किसानों और जंगली जानवरों का लफड़ा क्या है

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आज बच्चों के साथ बैठा नेशनल जियोग्राफिक चैनल देख रहा था।  भारत के पूर्वोत्तर के जंगलों पर सुन्दर वृत्तचित्र था वह।उत्तंग हिमालय से शुरू करके ब्रह्मपुत्र के विशाल फाट तक अचंभित कर देने वाले दृश्य। गोल्डन लंगूर, रेड पांडा, एशियाई काला भालू और न जाने क्या क्या।

 पर जैसे ही कहानी मनुष्य-जानवर द्वन्द पर उतरी, मुझे बड़ा दुःख हुआ। उसमें हाथियों के घटते रहवास को लेकर चिंता प्रकट की जा रही थी।  कहा जा रहा था के पूर्वोत्तर में जनसँख्या और खेती के लिए जमीन का लालच बढ़ रहा है। और इस लालच से हमारे हाथियों के लिए रहवास कम रह गया है।

क्या सच में किसानों का लालच हाथियों के घटते रहवास के लिए जिम्मेदार है?

इस बात को इस तरह से पेश किया जाता है जैसे यह कोई ब्रह्म-वाक्य हो, के भैया ! यही सच है.. जान लेयो। और बाकी सब  है मिथ्या। हमारी पहले से ही मूर्ख बनी मध्य-वर्गीय दुनिया को और मूर्ख बनाते रहने की साजिश है ये। मैं उत्तराखंड का रहने वाला हूँ। हमारे यहाँ भी जंगल थोक के भाव है।  वहां भी यही घिसी पिटी कहानी कई दशकों से लोग सुनाये जा रहे हैं। कर्मभूमि है मंडला, मध्य प्रदेश। तो यहां भी सेम राग है। के भैया, जे …

Rashtra Ka Naya Bodh | Harishankar Parsai | Hindi Satire

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जबलपुर से 90 किलोमीटर दूर मंडला में रहते हुए परसाई जी को उनके जन्मदिन पर श्रद्धांजलि देने का ख्याल आया। सुनिए, 1968 में लिखा उनका व्यंग्य - "राष्ट्र का नया बोध" .. लेखकों की यही ख़ास बात है। सालों बाद भी उनकी बात उतनी ही सारगर्भित और विचार के लायक है जैसी उस वक़्त थी। और हमारा राष्ट्रबोध भी उतना ही खोखला है जितना पहले था। ज्यादा लिखने की आवश्यकता नहीं। कृपा करके सुनियेगा जरूर।

मुझे ऑटो सेक्टर की चिंता क्यों नहीं है?

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कुछ निराश लोग ऑटो सेक्टर में आयी जबरदस्त मंदी से बेहद आहत हैं। उन्हें लगता है कि ये मंदी अर्थव्यवस्था में मंदी की तस्दीक करती है। पर पता नहीं क्यों, मेरा मन कहता है कि क्या फर्क पड़ता है।

कारें कौन खरीदता है ? अभी भी मुल्क में एक बड़ी आबादी के पास साइकिल तक नहीं है। आबादी का अधिकतर हिस्सा बस या रेल के जनरल डिब्बे से ही  सफर करता है। ये लोग तो शायद ही कभी सफर कर पाएं, गाडी में। कई बार मैंने इन लोगों को भेड़-बकरी की तरह गाँव की शेयर्ड जीप में लदे देखा है। ये लोग कभी क्या गाडी खरीदेंगे। गाडी न खरीद पाना नव-धनाढ्य वर्ग या नए पैसे वालों की समस्या है। ऐसे लोग जब पब्लिक ट्रांसपोर्ट का प्रयोग करने लगेंगे तो सरकार अपने-आप बसें खरीदेगी। इनमें से बहुतों को तो अब बस में सफर करने की आदत ही नहीं बची है। क्या पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बेहतर बनाने की योजना सरकार को नहीं बनानी चाहिए? एक के बाद एक राज्य सरकारें अपने बस परिवहन विभागों का निजीकरण करती आ रही हैं। कमर टूट गयी है सरकारी परिवहन के ढाँचे की। राष्ट्रीय स्तर पर इस समस्या पर कोई ध्यान क्यों नहीं देता। क्यों इस बात की कोशिश नहीं होती के ज्यादातर लोग गा…

उत्तर-विकासवाद कड़ी-3: नीमखेड़ा की समस्या क्या है?- केस विश्लेषण

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साथियों, पिछले रविवार, हमने जो केस आपसे साझा किया था, उसपर आप लोगों के कुछ जवाब प्राप्त हुए। उसमें से एक हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं। और उसके बाद हम नीमखेड़ा की समस्या की हमारी समझ पेश करेंगे। ये कहना बिलकुल मुनासिब होगा के हमारी समझ कोई धर्मोपदेश नहीं है जोकि गलत नहीं हो सकती । इसलिए हम चाहेंगे के पाठक अपना विवेक इस्तेमाल करें। और अपनी सोच को और पैना करें। केस मेथॅड हमारी तार्किक शक्तियों को बेहतर करने और सन्दर्भ को समझने की हमारी क्षमता को बढ़ाने के लिए होता है। यहाँ सही जवाब कुछ नहीं होता, सिर्फ तर्क होता है।

विशाल पंडित जी, ने हमें अपना उत्तर सुझाया है जोकि कुछ ऐसा है -

प्रश्न 1 - क्या आप विश्लेषण करके बता सकते हैं के नीमखेड़ा और बाकी गाँव के बीच में तनातनी की असली वजह क्या है?

समस्या यह है के पुराने गाँव नीमखेड़ा को अपने जंगल पर गलत तरीके से काबिज हुआ समझते हैं, बावजूद इसके कि नीमखेड़ा वालों को खुद सरकार वहां बसाई थी, वे खुद अपनी मर्ज़ी से नहीं गए थे।

प्रश्न २- यदि आप धीरेश की जगह होते तो क्या करते? विस्तार से बताइये। 
धीरेश को दोनों गाँव से बात करनी चाहिए। लोगों को विश्वास में लेकर ही …

उत्तर विकासवाद -कड़ी-2 - नीमखेड़ा की समस्या क्या है?

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उत्तर विकासवाद की बेहतर समझ बनाने के लिए हमने सोचा के क्यों न इस बार  केस स्टडी के तरीके का प्रयोग किया जाय। इस बार का ब्लॉग एक केस होगा आपके लिए। आपको कहानी के अंदर मौजूद सुरागों के जरिये, पूछे हुए सवाल का जवाब देना होगा। सबसे बेहतरीन जवाब को हम "मैं कबीर" के अगले अंकों में प्रकाशित करेंगे, आपके नाम के साथ। आप अंग्रेजी या हिंदी, किसी भी भाषा में जवाब दे सकते हैं। हम इस बार हिंदी न पढ़ सकने वालों के लिए ऑडियो भी अपलोड कर रहे हैं।

 मैं कबीर करीब 500 विकास विशेषज्ञों तक पहुँच रहा है। हम अच्छे जवाबों की उम्मीद करते हैं। यदि बेहतर जवाब आये तो आगे भी इस तरह से आप तक पहुंचेंगे। अपना विश्लेषण हम बेहतर जवाब के साथ प्रकाशित करेंगे।

उत्तर देने की अवधि - 11 अगस्त 2019 तक।

नीमखेड़ा  की समस्या क्या है? (2010)

सोनसाय को नहीं पता कि कैसे किया जाए ये। पर करना तो पड़ेगा। धीरेश भी परेशान है। उसने अपने टीम लीडर से वादा किया था के अगले साल नीमखेड़ा में वृक्षारोपण होके रहेगा। पर अगर पडोसी गाँव का साथ ही न मिला तो ये कैसे होगा। बारिश आने में बस दो महीने बचे हैं। अब तक झगड़ा ही न सुलझा है।  उसने अपने ट…