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मानव-वन्य-जीव मुठभेड़- महिलाओं पर असर: अपडेट

दोस्तों, यह एक बिलकुल नयी शुरुआत है जिसे मैं करने जा रहा हूँ। मैं अपने इस ब्लॉग में वनवासी  महिलाओं का वन्यजीवों के साथ आमना-सामना होने का एक लेखा जोखा अपने इस पोस्ट में अपडेट करता रहूंगा। मैं कोशिश  विषय से जुडी सभी खबरें मैं यहाँ मुहैया करता रहूं। उम्मीद है के इस तरह से इस तर्क को बल मिलेगा कि महिलाएं वन्य-जीवों का खतरा ज्यादा झेलती हैं।अपनी प्रतिक्रियाएं भेजिए और यदि आपको ऐसी कोई खबर लगे तो मुझसे जरूर यह साझा कीजिये ताकि मैं इस डाटाबेस को अपडेट करता रहूं। एक दूसरे पेज पर एक ट्रैकर बनाने का प्रयास भी करूंगा जिससे पूरे देश में महिलाओं पर इसके असर का बेहतर अंदाज़ा पैदा हो। धन्यवाद 
26/8/2020 https://india.mongabay.com/2020/08/resettlement-is-a-voluntary-option-for-families-in-wayanad-wildlife-sanctuary/31/8/2020https://www.thehindu.com/news/national/tamil-nadu/woman-killed-in-tiger-attack-in-mudumalai-tiger-reserve/article32485959.ece#!15/9/2020https://www.thehindu.com/news/cities/Coimbatore/woman-trampled-to-death-by-wild-elephant-near-coimbatore/article32608586.ece#!20/9/2020 https://…
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विकास की "इन्सेप्शन" टाइप मन:स्थिति

"चहुँ ओर विकास की गंगा बह रही है।""भाई साहब!! क्या कह रहे हैं? यह तो गन्दी नाली है !""अरे एक-दो गाँव देखकर क्या होगा, बड़ी तस्वीर तो यह है कि चहुँ ओर विकास की गंगा बह रही है। ""किसके विकास की ?""हमारे और आपके विकास की।" "अच्छा!! कैसे !""हमारे लीडर के दिमाग में एक ब्लूप्रिंट है, जिसे हमें लागू करना है।""अच्छा! कहाँ !""गाँव में, शहर में, हर जगह ""आपके लीडर को विकास का बेहतरीन अनुभव होगा ?""नहीं पर वह बहुत अच्छे विचारक हैं। उनके चीते से भी तेज़ दिमाग से गाँव की सच्चाई छुप नहीं सकती। ""अच्छा!! पर कैसे?""अरे! इन्सेप्शन फिल्म देखे हो कभी? नेओलार्डो डा पकरिओ वाली? ठीक वैसे ही। हमारे लीडर उसी तरह सोचते हैं। उनके दिमाग में एक ब्लूप्रिंट है। उन्होंने अपने मन में एक खाका बनाया है। और खाके के अंदर खाका है। ये प्योर क्रिएशन है। शुद्ध देशी घी टाइप का। ""कुछ समझ नहीं आया। थोड़ा ठीक से समझाइये।""पहले बताइये इन्सेप्शन फिल्म देखे हैं के नहीं। ""थोड़ी देख…

माटी मानुष चून : क्या गंगा एक मानव निर्मित नदी नेटवर्क बनने वाली है ?

"भारत में मानव निर्मित एक विशाल नदी नेटवर्क काम करता है, उसे वे लोग गंगा कहते हैं।"
 स्थापित पत्रकार, लेखक, और पर्यावरणविद, अभय मिश्रा की किताब "माटी  मानुष चून" की यह आखिरी पंक्ति है। किताब गंगा के आने वाले दुर्भाग्य की एक तस्वीर खींचती है। एक भयावह तस्वीर। जो पिछले २०० सालों से हमारे हुक्मरानों के लिए हुए अनाप-शनाप फैसलों की तस्दीक करता है। ये एक महान नदी के तिल तिल मरने की कहानी हैं। वह नदी जिसे  इस देश के करोड़ों लोग अपनी माँ कहते हैं। वह नदी जो एक पूरी भाषा, एक पूरी संस्कृति की जननी है, क्या आप मान सकते हैं कि मर रही है? ये किताब उस लम्हे को बयान करने की कोशिश है कि जब गंगाजल सिर्फ गंगोत्री में बचेगा, बनारस में नहीं। बाकी जगह सिर्फ पानी होगा, गंगाजल नहीं, जिसके बारे में कहावत थी कि गंगाजल कभी सड़ता नहीं। आप कह सकते हैं कि ये कल्पना है। पर पिछले 200 सालों में गंगा पर बने बांधों ने, बैराजों ने और गंगा किनारे रहते लोगों के बहते खून के फव्वारे ने आज की वह स्थिति पैदा की है जिसमें अब ठीक होने की क्षमता न के बराबर है। हम अपने नीति निर्धारकों के झूठों के महल पर निर्भर ह…

गफाम (GAFAM) और आवाम

गफाम !हमारे शब्दकोष में जुड़ता ये सबसे नया शब्द है। माने गूगल, एप्पल, फेसबुक, अमेज़ॉन और माइक्रोसॉफ्ट। ये वो कंपनियां हैं, जो आज हमारे पूरे युग को परिभाषित करती हैं। आज का युग ! कत्रिम बुद्धिमत्ता (artificial intelligence ), कत्रिम यथार्थ (virtual reality) का युग! जहाँ, सारा ज्ञान गूगल बाबा के पास है, "अपनों के बीच जाने के लिए" हमें फेसबुक, व्हाट्सएप्प का सहारा चाहिए, अमेज़न, जिसे आपने कभी देखा नहीं, वो "आपकी अपनी दुकान" है, एप्पल पूरी दुनिया में धनाढ्य वर्ग का स्टेटस सिंबल है और माइक्रोसॉफ्ट के बिना दुनिया के आधे से ज्यादा कंप्यूटर आप नहीं चला सकते। आज जब इन कंपनियों को लेकर आम चर्चा हो रही है, ख़ास तौर पर फेसबुक को लेकर हालिया विवाद को लेकर, हमें यह समझना चाहिए कि ये कंपनियां क्या बन चुकी हैं।आपको जानकारी होगी ही कि फेसबुक पर भारत में धार्मिक उन्माद फ़ैलाने वाले लोगों के  बयान को न रोकने के लिए आरोप लग रहे हैं। फेसबुक के लिए ये आरोप नए नहीं हैं। दुसरे देशों में भी ऐसे आरोप उसपर लगते रहे हैं, खास तौर पर अमेरिका में। ये आरोप हमारी ज़िन्दगियों में इन कंपनियों के दखल की बा…

माइक्रो-फाइनेंस का काला सच

हम देखेंगे। ..लाज़िम है के हम भी देखेंगे.. वो दिन के जिसका वादा है... 
पिछले 73 सालों के हज़ारों दिनों में हमारे हुकुमरानों ने हमसे कई वादे किये हैं। जब सोचता हूँ उनके बारे में तो ऊपर लिखी फैज़ की नज़्म ही याद आती है।ये वादे असल में जुमले साबित हुए, जो अवाम को शांत रखने के लिए समय समय पर गढ़े जाते रहे हैं। खैर !!
पिछले दो दशकों से इन्हीं हज़ारों जुमलों में से एक की बात हम आज यहाँ कर रहे हैं।  वह है "वित्तीय समावेश" (financial inclusion )। वित्तीय समावेश की पूरी कहानी का लब्बोलुआब ये है कि गरीब को वित्तीय संस्थानों से जोड़ देने से और उसे कर्ज योग्य (creditworthy) बना देने से उसकी गरीबी दूर हो सकती है। आपने जरूर सुना होगा कि हमारे देश में ३० करोड़ लोग अभी भी बैंकों की जद से बाहर हैं। यह बात ऐसे कही जाती है जैसे बस इसी एक वजह से वो अभी तक गरीबी की गिरफ्त में हैं। कहा जाता है कि ये लोग छोटे छोटे क़र्ज़ लेकर पूँजी को अपने कारोबार में लगा सकते हैं जिससे फिर वह ज़्यादा पैसा कमा सकते हैं। इसे माइक्रो-फाइनेंस कहते हैं। 
90 के दशक से माइक्रो-फाइनेंस या वित्तीय समावेश के मुहावरे ने विकास के शब्दकोष …

महत्वहीनता की ओर अग्रसर सिविल सोसाइटी

उपरोक्त लेख श्री अमिताभ बेहार (निदेशक ऑक्सफैम ) द्वारा लिखा गया है। इंडियन डेवलपमेंट रिव्यु की वेबसाइट पर यह लेख 28 मई 2020 को छपा। अपनी बेबाकी और पैने सवालों के कारण इस लेख की काफी चर्चा हुयी है। हमें लगा कि इस लेख को हिंदी के पाठकों तक पहुंचना चाहिए इसलिए इसका अनुवाद हम यहाँ दे रहे हैं। अनुवाद शब्द दर शब्द किया हुआ नहीं है। पर लेख में व्यक्त किये गए विचारों और तथ्यों को  इसमें नहीं बदला गया है। हम इस लेख के विचारों के पूरे हामी नहीं हैं पर इसके प्रश्नों पर विचार करना जरूरी है। आप इस लेख को अंग्रेजी में यहाँ पढ़ सकते हैं -
https://idronline.org/civil-societys-road-to-irrelevance/
धन्यवाद !!
सुप्रीम कोर्ट ने ६ मार्च 2020 को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया जिस पर बहुत कम लोगों ने ध्यान दिया। सुप्रीम कोर्ट ने INSAF (इंडियन सोशल एक्शन फोरम) नाम की सामाजिक संस्था के पक्ष में फैसला सुनाते हुए विदेशी अंशदान विनियमन क़ानून, 2011 के प्रावधानों के विपरीत सिविल सोसाइटी के  राजनीतिक उद्देश्य से हस्तक्षेप करने के अधिकार को वैध ठहराया । इस फैसले को  भारत के जनतंत्र की जड़ों को मज़बूत करने की दिशा में एक महत्त्व…

गायब होते जुगनू

आखिरी बार अपने जुगनू कब देखा था ?  अब ये न कहियेगा कि परवीन शाकिर की ग़ज़ल में देखा था। 
"जुगनू को दिन के वक़्त परखने की ज़िद करें  बच्चे हमारे अहद के चालाक हो गए "
बचपन में हमारे घरों में घुस जाते थे जुगनू। रात को बत्ती जाते ही दिखने शुरू हो जाते थे। दिप दिप उनकी रौशनी में कब वो वक़्त कट जाता था, पता  ही नहीं चलता था। मेरी उम्र के लोगों ने तो ज़रूर अपने बचपन में जुगनू देखे होंगे।  सैकड़ों, हज़ारों एक ही पेड़ पर। तब ज़िन्दगी में जुगनुओं की बड़ी जगह थी। बत्ती तो आती जाती रहती थी। पर जुगनू चमकते रहते थे। फिर कुछ लोग उन्हें देख कर कविता कहानी  लिखते थे और कुछ  बस उन्हें देखते थे। घंटों। फिर जैसे ही बत्ती आयी तो सारे बच्चे चिल्लाते थे "लाइट आ गयी... और सब घर के अंदर। कभी कभी कोई जुगनू घर के अंदर भी आ जाता था। वो उन कुछ कीड़ों में से थे  जिनसे बच्चे डरते नहीं थे। बल्कि खेलते थे। 
मुझे नहीं लगता के मेरे बच्चे सहज भाव से जुगनू को कभी छू पाएंगे। उनकी उम्र के सभी बच्चे शायद जुगनुओं के झुण्ड को देखकर डर जाएं क्यूंकि उन्होंने तो ऐसा देखा ही न होगा अपने जीवन में। मेरी चिंता ये है के फिर वो चालाक क…

89 का बचपन - मेरे बाबा

बहुत सोच  विचार के बाद अब लिखना शुरू किया हूँ अपने बचपन के बारे में। बहुत से अनुभव  संजोना अब बहुत जरूरी सा महसूस हो रहा है। शायद किसी को इस से बहुत फर्क न पड़े पर अगर एक को भी पड़ता है तो मुझे मलाल नहीं रहेगा कि  मैं उस तक पहुंचा नहीं।

किये जाओ कोशिश मेरे दोस्तों !! मेरे बाबा ये नज़्म सुनाते रहते थे।

जो पत्थर पे पानी पड़े मुत्तसिल।
"मुक्कासिल?" मैं बोलता था।  और वो  बोलते थे, "उंहू, मुत्तसिल बोलो, मुत्तसिल" !!

"अच्छा!!", मैं बोलता था। और फिर शुरू!!

जो पत्थर पे पानी पड़े मुत्तसिल
तो घिस जाए बेशुबाह पत्थर की सिल
रहोगे अगर तुम युहीं मुत्तसिल
तो एक दिन नतीजा भी जायेगा मिल

किये जाओ कोशिश मेरे दोस्तों !
किये जाओ कोशिश मेरे दोस्तों!

गर ताक़ में तुमने रख दी क़िताब
तो क्या दोगे तुम इम्तिहाँ में जवाब
न पढ़ने से बेहतर है पढ़ना जनाब
आखिर हो जाओगे एक दिन कामयाब

 किये जाओ कोशिश मेरे दोस्तों !
किये जाओ कोशिश मेरे दोस्तों !

"ये नज़्म हमने तीसरी जमात में याद करी थी। अब भी याद है !!"

जब भी बाबा ये नज़्म दोहराते थे तो यह जताते जरूर थे कि उनकी याददाश्त कितनी अच्छी है। और उन…

covid-19 और वीरेन डंगवाल के अश्वारोही

वीरेन डंगवाल जी आपके अश्वारोही चल दिए हैं। 
Covid-19 के कारण उपजे हालातों में दिल्ली के आनंदविहार बस अड्डे पर घर जाने को बेचैन इन अश्वारोहियों की भीड़ बिलख रही थी।पिछली दो सदियों में विकास के जिस मॉडल ने करोड़ों लोगों को शहरों की ओर धकेला, एक पल को ऐसा लगता है कि उस मॉडल की एक्सपायरी डेट नज़दीक आ गयी है।

वीरेन डंगवाल जी, आपके अश्वारोही अपने पड़ाव से घर की ओर  निकल चुके हैं। 

लोग वापस गाँव की ओर चल दिए हैं -और वो भी पैदल।  पहले से कहीं ज्यादा बेहाल, कमज़ोर और थके  हुए लोग। बहुत से पुलिस की ज़्यादती के भी शिकार हो रहे हैं। और बहुत कम जगह पुलिस ने इनका साथ भी दिया है। क्या इसी दिन के लिए ये करोड़ों लोग अपने अपने गाँव छोड़कर शहर आये थे? लोगों के पास हज़ारों सवाल हैं और जवाब एक भी नहीं। स्किल इंडिया की एक ही झटके में हवा निकल गयी और उन दावों की भी जिनके हिसाब से इन शहरों की तरक्की में गाँव के आदमी को उसकी आकांक्षाएं (aspirations) पूरी करने की जगह मिलनी थी । इससे साबित हो गया कि शहर में बसे ये गाँव के लोग अभी भी गाँव में ही अपनापन ढूंढते हैं। मुश्किल में उन्हें बिलकुल यकीन नहीं है कि ये शहर उन्हें पन…

महिलाएं और साझे संसाधन

क्या आप जानते हैं कि आखिर पितृसत्ता पैदा कहाँ से हुयी? महिला-पुरुष की भूमिका का बंटवारा कहाँ से शुरू हुआ? कई नारीवादी अब यह मानते हैं कि पितृसत्ता की जड़ "संपत्ति" या "मिल्कियत" के विचार में है, खास तौर पर निजी संपत्ति के विचार में। प्राकृतिक संसाधनों पर मनुष्य के अधिकार की सोच ने "विरासत" में संसाधनों को पाने के विचार को खाद पानी दिया। "मैं और मेरी संतान इस जमीन के मालिक होंगे, सदा सदा के लिए", इस विचार से ही महिला की प्रजनन करने की प्राकृतिक शक्ति को उसी की आज़ादी के खिलाफ इस्तेमाल करने का विचार पैदा हुआ। मानव जाति के अनुवांशिक विकास के दौरान घटे इस प्रागैतिहासिक अन्याय के कारण महिलाओं का मानव समाज में स्थान बच्चे पैदा करने की भूमिका तक ही सीमित हो गया।

हालाँकि पुरुष जमीन के हर टुकड़े पर अपना राज कायम नहीं कर पाए। हज़ारों लाखों एकड़ जमीन और समुन्दर आज भी निजी मिलकियत नहीं हैं। किसी तरह से समाजों द्वारा साझा किये जाते रहे हैं। पितृसत्ता ने हालाँकि सत्ता के और विकसित रूप पैदा किये जैसे राज्य, धर्म, जाति, कारपोरेशन और यहाँ तक कि जनतंत्र भी (जहाँ महिल…