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अजय बंगा की दावोस रोजगार सूची — और वह भारत जो इससे बाहर रह जाता है

  हाल ही में दावोस में, वर्ल्ड बैंक ग्रुप के अध्यक्ष श्री अजय बंगा ने भारत के एक सबसे अहम सवाल का सीधा जवाब दिया: रोजगार कहां से आएंगे? एक पैनल चर्चा में, उन्होंने भारत में रोजगार सृजन के पांच प्रमुख क्षेत्रों की पहचान की — इंफ्रास्ट्रक्चर, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा, छोटे किसानों की कृषि जिसे तकनीक और बाजार के माध्यम से समर्थन मिलेगा, पर्यटन और मूल्य-वर्धित विनिर्माण। यह एक तार्किक सूची है और कई मायनों में परिचित भी। लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि इसमें क्या शामिल है, उतना ही कि इस सूची के बाहर क्या रह गया। श्री बंगा ने अपने पंजाब के मूल की बात करते हुए कृषि को रोजगार का एक महत्वपूर्ण इंजन बताया। यह सही है। पंजाब भारतीय कृषि की कहानी में हमेशा अग्रणी रहा है — एक ऐसा सितारा जिसने पचास वर्षों से अधिक समय तक देश के लाखों लोगों को भोजन दिया। छोटे किसानों का समर्थन करने के लिए बेहतर बाजार, मूल्य निर्धारण, वस्तुएं और पैमाने के लाभ पर उनका जोर समयोचित है। उनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि उन्होंने केवल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) पर ध्यान केंद्रित करने की आम अर्थशास्त्रियों की प्रवृत्ति से परे देखा। अधिका...
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Ajay Banga’s Davos Jobs List — and the India It Leaves Out

  At Davos recently, Mr Ajay Banga, President of the World Bank Group, offered a crisp answer to one of India’s most urgent questions: where will the jobs come from? In a panel discussion, he identified five key areas for job creation in India — infrastructure, primary health care, small farmer agriculture supported by technology and markets, tourism, and value-added manufacturing. It is a sensible list, and in many ways a familiar one. But what matters is not only what is included. It is also what remains outside the frame. Mr Banga spoke of his roots in Punjab while emphasizing agriculture as an important engine of employment. Rightly so. Punjab has been at the forefront of India’s agricultural story — a star that fed millions across the country for more than half a century. His insistence on supporting small farmers through better markets, pricing, commodities, and the benefits of scale is timely. To his credit, Mr Banga also moved beyond the usual economist’s obsession with ...

क्या AI के युग में आलोचनात्मक सोच (Critical Thinking) पर्याप्त है?

  पिछले कुछ वर्षों में, खासकर AI के तेज़ी से फैलने के बाद, आलोचनात्मक सोच पर बहुत चर्चा हो रही है। इसे 21वीं सदी में जीवित रहने के लिए सबसे ज़रूरी कौशलों में से एक बताया जाता है। आम तौर पर आलोचनात्मक सोच का मतलब होता है—जानकारी का विश्लेषण करना, तार्किक रूप से सोचना, अलग-अलग दृष्टिकोणों को समझना और अपनी ही धारणाओं पर सवाल उठाना। लेकिन जब मैं अपने आसपास की दुनिया को देखता हूँ, तो एक बेचैनी महसूस होती है। जब मैं समाचार देखता हूँ या यह देखता हूँ कि किस तरह बड़े पैमाने पर गलत जानकारी फैलाई जा रही है—अक्सर सत्ता में बैठे लोगों द्वारा—तो मन में सवाल उठता है: क्या आलोचनात्मक सोच वास्तव में बड़े पैमाने पर विकसित की जा सकती है?  साथ ही, हम “ब्रेन रॉट” जैसे नए शब्द भी सुन रहे हैं, जो सोशल मीडिया और AI के अत्यधिक उपयोग से सोचने की क्षमता के सुस्त होने की ओर इशारा करते हैं। इससे एक और सवाल उठता है: क्या आलोचनात्मक सोच आगे चलकर एक दुर्लभ वस्तु या दुर्लभ प्रतिभा बनकर रह जाएगी? जब मैं इस पर और सोचता हूँ, तो एक और असहज सवाल सामने आता है:  क्या आलोचनात्मक सोच ने अब तक समाज की वास्तव मे...

Is Critical Thinking Enough in the Age of AI?

  In the last few years, especially with the rapid rise of AI, critical thinking has become one of the most talked-about ideas in education and public discourse. It is often described as one of the most important skills required to survive in the 21st century. Critical thinking is usually defined as the ability to analyse information, reason logically, understand different perspectives, and reflect on one’s own biases. Yet, when I look at the world around me, I feel uneasy. When I watch the news or see the massive scale at which misinformation is spread—often by those in positions of power—I find myself wondering: is critical thinking really something that can be cultivated widely? At the same time, we are hearing new words like “brain rot” , used to describe how social media platforms and excessive dependence on AI may be dulling our ability to think deeply and critically. This leads me to ask: will critical thinking become a rare commodity, or even a rare talent? As I reflect...

हिरन और उसका जंगल

           उन्नीस्वी सदी के इंग्लैंड में जब सामुदायिक जमीनों पर बाड़ा बंदी हो रही थी और उन्हें निजी स्वामित्व में सौंपा जा रहा था, उस वक़्त, इंग्लैंड के लोककवियों  ने कॉमन्स पर कई गीत रचे।  "The Goose and the Common" ऐसी ही एक कालजयी रचना है।   कबीर के  दोहों की तरह इस कविता पर भी सबका हक़ है।              The Goose and the Common The law locks up the man or woman.                                                                               Who steals the goose from off the common But leaves the greater villain loose Who steals the common from the goose. The law demands that we atone When we take things we do not own But leaves the lords and ladies fine Who take things that are yours and mine. The p...

क्या लोगों की भागीदारी से सच में सोच बदलती है?

  एक गाँव के छोटे से प्रयोग ने क्या दिखाया** (ध्वनि, धीरेश, सुहास, कीर्तन, राजेश, उमेश, रामकुमार और FES की बिछिया टीम को 2019 में किये इस प्रयोग के लिए आभार) विकास की दुनिया में “भागीदारी” शब्द बहुत चलता है। हर संस्था कहती है कि वे लोगों को साथ लेकर काम करती हैं । लेकिन क्या सच में लोगों की भागीदारी से उनकी सोच और हालात बदलते हैं? या यह बस एक औपचारिक तरीका बन गया है, जिसमें असली समस्याएँ वही की वही रहती हैं? इस सवाल को समझने के लिए दो बड़े विचारकों को याद करना जरूरी है—गांधी और पाउलो फ्रेरे। गांधी ने ऐसे समाज की कल्पना की थी जहाँ लोग खुद अपने फैसले लें। उन्होंने इस तरह भागीदारी के "क्या" का उत्तर देने का प्रयास किया। जबकि फ्रेरे ने बताया कि यह "कैसे" होगा—बातचीत करके साथ में सीखने  से, मुद्दों की पैनी समझ बढ़ाने से और सही सवाल पूछने से जिससे शोषक  व्यवस्था  में सुधार किया जा सके । ये दोनों मिलकर बताते हैं कि असली भागीदारी सिर्फ बैठकों में लोगों को बुलाने से ज्यादा है। यह लोगों को यह समझने का मौका देती है कि उनके जीवन पर कौन-सी ताकतें असर डाल रही हैं। पाउलो फ्रेरे...

Do Participatory Approaches Spark Critical Consciousness? Inside a Village Experiment That Reveals What Development Often Misses**

  (Acknowledgements: Dhwani Lalai, Keertan Baghel, Ramkumar, Dheeresh, Umesh and Rajesh of Foundation for Ecological Security in 2019-20) For decades, “participation” has been one of the most overused—and least understood—words in development. From large donor programmes to grassroots NGOs, everyone claims to involve the community. But does participation really empower people? Or has it become a comfortable ritual that leaves deeper structures untouched? Mahatma Gandhi: Google images Paulo Friere: from shutterstock To answer this, it helps to return to two thinkers who shaped the idea long before it became a development buzzword. Mahatma Gandhi imagined the what of a true democracy—self-governed, self-reliant communities shaping their own futures. Paulo Freire offered the how —dialogue, critical awareness and the courage to question oppression. When put together, they point toward a participatory approach that is not just about including people in projects, but about enabling t...

प्रेम की राजनीति

इस आलेख की विषयवस्तु 2011 में बनी हॉलीवुड फिल्म "पॉलिटिक्स ऑफ़ लव" नहीं है जिसकी कहानी एक डेमोक्रेट पार्टी समर्थक और एक रिपब्लिकन पार्टी समर्थक पुरुष और स्त्री के बीच प्रेम की गुंजाइश को तलाशती महसूस होती है।  मालूम हो कि भारतीय अभिनेत्री मल्लिका शेरावत ने उसमें एक अहम् किरदार निभाया था। मैं मई 2023 में मृणाल पण्डे जी के द वायर में छपे " Why We Need to Embrace a Politics of Love" नामक लेख के बारे में भी बात नहीं कर रहा जिसमें उन्होंने राहुल गाँधी द्वारा प्रधानमंत्री को संसद में गले लगाने के उपक्रम पर टिपण्णी की थी।  ये विचार जो मैं यहाँ बांटना चाहता हूँ वो हमारे चारों ओर बढ़ती हिंसा और उसके मेरे और मेरे आसपास के लोगों के  अंतर्मन पर लगातार पड़ने वाले असर का परिणाम है।  कोई दिन ऐसा बीतता नहीं जब कोई ऐसी बात न होती हो जिससे मन में तेज़ नफरत न फूटती हो।  पर क्या करें। कुछ न कर पाने की विवशता से निकला हुआ लेख है ये। एक व्यथित मन की किंकर्तव्यविमूढ़ता का अपराधबोध।   मुझे यकीन है कि जो मैं लिख रहा हूँ वह कोई मौलिक विचार नहीं है। मुझे तो अम्बेडकर के प्रसिद्द लेख ...

जनवादी मीडिया और डिजिटल प्रयोग

फोटो फ्रीडम हाउस वेबसाइट से साभार    कुछ महीने पहले मैंने वैकल्पिक मीडिया पर एक लेख लिखा था। इसमें  मीडिया की मुख्यधारा से अलग गए कुछ पत्रकारों और संस्थानों के प्रयासों को रेखांकित करते हुए इन प्रयासों की समीक्षा करने की कोशिश की थी। हाल ही में NDTV  के अधिग्रहण के बाद रविश कुमार के यूट्यूब चैनल पर भारी दर्शकों की भीड़ ने वैकल्पिक मीडिया की ताक़त को रेखांकित किया है। मगर इस बार मैंने कोशिश की है कि जनवादी मीडिया के डिजिटल प्रयोगों की कुछ समीक्षा की जाए जोकि ऐसे लोगों की कमान में है जिनका जन-आंदोलनों से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है।जनवादी मीडिया आमतौर पर डिजिटल मीडिया के पेशेवर स्वरुप के मुक़ाबले कहीं अधिक मुश्किल में अपना काम कर रहा है। घोर संसाधनों का अभाव के बावजूद जनवादी मीडिया पूरी कोशिश करता है जन-साधारण के पक्ष में कुछ हवा बनाने की। हालाँकि आम तौर पर पाठकों तक पहुंचना जनवादी मीडिया के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है खासतौर पर जब डिजिटल युग में इतनी सारी सामग्री हमारे सब तरफ मौजूद है।  जनवादी मीडिया के कई उदाहरण हैं।  जैसे बहुजनवादी विमर्श को प्रोत्साहित करती "फॉर...