कभी कभी सोचता हूँ कि जो मैं सोचता हूँ, क्या मेरी ही मिलकियत है? मेरी सोच, मेरा मौलिक विचार! क्या इस तरह की कोई चीज़ होती भी है? मेरी सोच में क्या उन सैकड़ों लोगों की भागीदारी नहीं, जिन से मैं पिछले 45 सालों के जीवन में मिला, जिनसे बातें की, जिनसे सीखा या जिनको नाराज़ किया? या उनसे जिनकी किताबें पढ़ी, या टीवी पर या इन दिनों यूट्यूब पर देखा या सुना। फिर भी ये ओरिजिनल थॉट या मौलिक विचार वाला आईडिया कहाँ से आता है।
मुझे लगता है कि इंसान के किसी वस्तु पर अधिकार करने के विचार के पीछे उस वस्तु के प्रति उसका लगाव एक कारण रहा होगा । लेकिन विचारों के साथ ऐसा पहले पहल कैसे हुआ होगा? हज़ारों साल तक तो विचार सिर्फ याद करके ही सुनाये जाते रहे। हमारी याददाश्त ही पहली विचार रही होगी।फिर ये कैसे हुआ कि इंसान को उसके विचारों से जोड़ा जाने लगा और इंसान भी अपने विचारों और विचार श्रृंखलाओं पर भी अपना अधिकार जमाने लगा।
विचार जबतक आपके ही पास है, और कोई दूसरा व्यक्ति आपके साथ उसे बांटता नहीं है, तब तक उस विचार का कोई महत्व नहीं हो सकता। कोई विचार महत्व नहीं रखता यदि उसको समाज में बांटने वाले और लोग ही नहीं हैं। तो जो बांटने वाले हैं, क्या उनका उस विचार की उत्पत्ति में कोई भूमिका नहीं? मुझे तो लगता है कि कोई नया विचार आता ही इस विश्वास से है कि कोई तो होगा जो इस विचार में अपनी रूचि दिखायेगा। मुझे नहीं लगता कि कोई मनुष्य सिर्फ अपने लिए विचारों को पैदा करता है। बड़े बड़े त्यागी सन्यासी भी असल में विचारों के प्रचारक ही तो थे। अपने विचारों को बांटने के उनके कौशल और उन्हें मानने वालों की भीड़ ने उन्हें इतनी प्रतिष्ठा दिलाई कि कुछ तो ईश्वर का दर्जा भी प्राप्त कर गए। पर क्या उन्होंने अपने विचार को एक सम्पदा या प्रॉपर्टी या फिर पूँजी या कैपिटल कहा? जहाँ तक मैं जानता हूँ, ऐसा तो उन्होंने नहीं किया। हालाँकि आज जरूर उनके विचारों पर अधिकार जमाने की प्रक्रिया तेज़ हो गयी लगती है। आर्थिक तौर पर नहीं तो राजनीतिक तौर पर। आध्यात्मिक विचारों पर धार्मिक ठेकेदारों का काबिज हो जाना ऐसा ही संकेत देता है।
या फिर ऐसा हुआ होगा कि यदि कोई विचार आपके मन में आया, उसकी जवाबदेही तय करने की ज़रुरत होगी। उदाहरण के रूप में मान लीजिये, किसी कबीले में किसी एक व्यक्ति ने शिकार के लिए जाने से पहले उसकी योजना को बदलने की बात की हो तो बाकी कबीले वाले चाहेंगे कि वह उस विचार की जिम्मेदारी ले। कोई तो कहेगा भाई..कि ये तुम्हारा विचार है और स्थापित विचार से अलग है। तो क्या जवाबदेही के सवाल को विचार पर अधिकार की ज़रुरत मान लिया जाए। यदि आदिमानव ने अपनी गुफाओं में चित्र बनाये, तो क्या वह उस चित्र के विचार पर अपना हक़ जमाने के लिए थे? जहाँ तक मैं जानता हूँ, ऐसा नहीं है। किसी चित्र कहानी, लेख को अपना कहने का विचार काफी सालों बाद पैदा हुआ। नहीं तो वह मात्र कहानियां ही थीं, अपनों या अपने जैसों के साथ बांटने के लिए।
हमारे मन में विचार कैसे आते हैं? ज़ाहिर है, वह हमारी तरबियत, हमारे आसपास के माहौल से। हमारे विचार किसी दूर ग्रह से नहीं, इसी पृथ्वी पर जन्म लेते हैं और ख़त्म हो जाते हैं। लेकिन विचार प्रकृति की वो देन है जो हमें मनुष्य बनाती है। पर विचारों को संकलित करके उनपर अधिकार जमा लेने और उसे बौद्धिक सम्पदा कहने का विचार ज़्यादा पुराना नहीं है। गूगल बाबा के अनुसार, वेनिस में 1454 में पहली बार विचारों या ज्ञान को बौद्धिक सम्पदा के रूप में एक कानूनी जमा पहनाया गया। हालाँकि, व्यापारिक समाजों, कारीगरी की दुनिया में पारिवारिक राज़ का विचार तो इससे पहले ही था। मसलन, प्राचीन चीन में विकसित बहुत सी तकनीकों को वहां से दूसरे देश में ले जाना गैर कानूनी था। इसलिए दूसरे देशों में रेशम, कागज़ और बारूद के अविष्कार देर से पहुंचे। विचारों पर पहरे बिठाने का काम संपत्ति पर पहरे बिठाने के विचार के साथ साथ ही मज़बूत हुआ। बूढ़े बुजुर्गों की कहानियों, ओझाओं, सन्यासियों तक तो सब ठीक था। पर जब विचारों को पुस्तकालयों में, धार्मिक अनुष्ठानों, कारखानों में, कारीगरी में क़ैद किया जाने लगा, तो उस व्यवस्था को बल मिला जिससे समाज में विषमता बढ़ी।
और फिर आया दौर मशीनों का। संभ्रांत वर्ग को तब नयी सोच पर भी पहरे बिठाने की ज़रुरत महसूस हुई होगी। इस दौर ने पेशेवर लोगों के एक ऐसे समाज को पैदा किया जो इस व्यवस्था से पहले समाज का एक छोटा सा वर्ग ही होते थे। इस दौर ने हुनर और विचारों को कॉलेजों की उपाधियों, समझौतों, पेटेंट और कॉपीराइट की बपौती बना दिया। वकीलों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, चार्टर्ड अकाउंटेंट, और ऐसे कई पेशों का समाज, जो दिखने में बहुत खुला खुला दीखता था पर था उसी सड़े गले सामाजिक ढांचे का एक अक्स ही। यदि ऐसा न होता तो दुनिया भर में सिर्फ गोरे लोगों का ही इस समाज में वर्चस्व न होता या फिर हमारे देश में तथाकथित ऊंची जातियों का। इस प्रक्रिया ने "विचार" को ज्ञान में बदलने की प्रक्रिया को बहुत तेज़ कर दिया। विचारों के लिखे जाने से और लिखे हुए विचार पर मौलिक होने का ठप्पा लगने ज्ञान का प्रोडक्ट बनाना आसान हो गया और फायदेमंद भी।
हज़ारों सालों से संचित परंपरागत ज्ञान को भी संरक्षण देने की कोशिश हुयी, अलबत्ता बहुत देर में और मुझे तो लगता है कि उस पहल ने नुक्सान ही ज्यादा किया क्योंकि उसने एक ऐसे ज्ञान को संरक्षण देने की कोशिश की जो इस विचारों पर पहरे लगाने की इस व्यवस्था को ही नहीं मानता। परंपरागत ज्ञान संरक्षण देने की आड़ में उसकी कीमत लगाने की कोशिश खूब हुई है पिछले 30-40 सालों में। अभी भी परंपरागत ज्ञान को एक दिखावटी दयाभाव (patronizing attitude) के साथ ज्ञान की मुख्यधारा में रखा जाता है। पहले तो इसकी खूब लूट हुयी और बाद में दिखावे के लिए उसे म्यूजियम का स्पेसिमेन बनाने की प्रक्रिया शुरू की गयी जो आज तक चल रही है।
क्या कभी किसी ने इसका विरोध नहीं किया? इसे समझा नहीं ? बिलकुल इसका विरोध हुआ। बल्कि लोग शहीद भी हुए इस लड़ाई में। अलबत्ता हमने कभी उनकी लड़ाई को लड़ाई नहीं समझा। 24 साल के हार्वर्ड के छात्र आरोन स्वार्ट्ज़ ने 2010 में 48 लाख शोध पत्रों को डाउनलोड किया और उन्हें जनता के लिए खोल दिया। JSTOR व्यवस्था इन सारे पत्रों को संकलित करके इनके प्रयोग करने वाले लोगों से फीस वसूलती थी। जल्दी ही स्वार्ट्ज़ को गिरफ्तार कर लिया गया और उसपर गबन का मुकदमा दायर किया गया जिससे उसे 35 साल की सजा हो सकती थी। इस प्रक्रिया से स्वार्ट्ज़ कभी नहीं उबर पाया। 2013 में २६ साल की उम्र में उसने आत्महत्या कर ली। इस घटना ने ज्ञान की शोषणकारी व्यवस्था पर बहुत दबाव डाला। कुछ समय बाद JSTOR ने लाखों शोध पत्रों को जनता के लिए खोल दिया। पर अभी भी ज्ञान का पूँजीवाद (knowledge capitalism) और ज्ञान का उद्योग लगभग उसी पुराने ढर्रे पर है और उसका पूरा मॉडल ज्ञान और विचारों पर अधिकार करने की प्रवत्ति पर ही टिका हुआ है।
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