जून का महीना बीतने को है, लेकिन क्या आपने गौर किया है कि आसमान से वो राहत की फुहारें गायब हैं जिनका हम हर साल इंतजार करते हैं? आज जब हम और आप यह बात कर रहे हैं, भारत इस सदी के सबसे गंभीर मानसून संकटों में से एक का सामना कर रहा है। सरकारी आंकड़ों (IMD) के मुताबिक, इस साल जून के महीने में सामान्य से करीब 42% से 46% तक कम बारिश दर्ज की गई है, जिसने 21वीं सदी के सबसे सूखे जून की याद दिला दी है। देश के मुख्य कृषि क्षेत्रों जैसे महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गुजरात में हाहाकार है; किसान बुआई नहीं कर पा रहे हैं और कंक्रीट के शहर गर्मी से उबल रहे हैं। आमतौर पर मानसून के इस तरह अचानक रूठ जाने या थम जाने का सारा दोष 'ग्लोबल वॉर्मिंग', अल-नीनो (El Niño) या समुद्र के गर्म होने के सिर मढ़ दिया जाता है। लेकिन भारत के बेहतरीन वैज्ञानिकों की लगातार आ रही रिसर्च ने एक ऐसा कड़वा सच सामने रखा है, जिसके जिम्मेदार कहीं न कहीं हम खुद हैं। विज्ञान कहता है कि मानसून के इस तरह कमजोर होने की एक बहुत बड़ी वजह हमारे ठीक सामने है— हमारे देश की जमीन के उपयोग, खेती के तौर-तरीकों और हरियाली के बदलते स्वरूप (LUL...
सम-सामायिक विषयों, पोस्ट डेवलपमेंट (उत्तर विकासवाद) और विकास के वैकल्पिक मार्गों की बात; जंगल के दावेदारों की कहानियां, कुछ कविताएं और कुछ अन्य कहानियाँ, व्यंग्य