वैज्ञानिकों की शह पर कैसे औद्योगिक क्षेत्र ने पशुधन उत्सर्जन की पूरी बहस का रुख अपने फायदे में मोड़ लिया है
कैमल फ्यूचर्स (Camel Futures)
मूल लेखक: इल्से कोहलर-रोलेफ्सन (Ilse Köhler-Rollefson)
मूल ब्लॉग का लिंक: https://open.substack.com/pub/1805ilse/p/camels-methane-and-the-reductionist?r=35vkn0&utm_campaign=post-expanded-share&utm_medium=web
ऑस्ट्रेलिया में ऊँटों को एक समस्या (pests) माना जाता है और उनकी संख्या पर काबू पाने के लिए अक्सर उन्हें हेलीकॉप्टर से गोली मार दी जाती है। यह हकीकत दुनिया भर के ऊँट प्रेमियों को बहुत परेशान करती है। लगभग 15 साल पहले, ऑस्ट्रेलिया के इन जंगली ऊँटों को मारकर 'कार्बन क्रेडिट' कमाने की योजना भी बनाई गई थी। दावा यह था कि हर ऊँट हर साल एक टन मीथेन छोड़ता है—एक ऐसी ग्रीनहाउस गैस जो 20 साल के पैमाने पर देखें तो कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_2$) से 80 गुना ज्यादा खतरनाक है।
इसके जवाब में, मोरक्को के वैज्ञानिकों की एक टीम ने एक रिसर्च की ताकि ऊँटों और गायों के मीथेन उत्सर्जन की सीधी तुलना की जा सके। उन्होंने पाया कि अगर दोनों को एक जैसा ही चारा दिया जाए, तो ऊँट, गायों के मुकाबले सिर्फ एक-तिहाई (1/3) मीथेन ही छोड़ते हैं। चिड़ियाघरों में रहने वाले ऊँटों पर रिसर्च कर रहे स्विस वैज्ञानिकों को भी ऐसे ही नतीजे मिले। उन्होंने इसकी वजह ऊँटों की धीमी चयापचय प्रक्रिया (slow metabolism) को बताया।
ऊँटों की वकालत करने वाले 'कैमल्स4ऑल' (Camels4All) जैसे संगठनों के लिए तो यह अपनी बात को आगे बढ़ाने का एक बेहतरीन जरिया बन गया। लेकिन सच कहें तो, पशुधन (livestock) के मीथेन उत्सर्जन को कम करने की यह पूरी बहस ही बुनियादी तौर पर दोषपूर्ण है। मुझे खुशी है कि हाल ही में नैरोबी में अफ्रीकी सांसदों के एक सेमिनार में, जो जलवायु कार्रवाई और मीथेन कटौती पर था, एक पारंपरिक चरवाहा (pastoralist) समुदाय से आने वाले सांसद ने खुलकर इसके खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने साफ कहा कि 'ग्लोबल मीथेन प्लेज' के तहत देशों ने मीथेन को 30% कम करने का जो वादा किया है, उसकी बलि चढ़ाने के लिए गरीब चरवाहों के मवेशियों को मारना कतई मंजूर नहीं है।
पशुधन से मीथेन कम करने के इस पूरे तौर-तरीके में इतनी खामियां हैं कि समझ नहीं आता कि शुरुआत कहाँ से की जाए।
कुदरती चक्र बनाम प्रदूषण: पहली बात यह कि मवेशी जो मीथेन छोड़ते हैं, वह प्राकृतिक जैविक चक्र (biogenic) का हिस्सा है। वह पर्यावरण में पहले से ही मौजूद है—पौधे हवा से कार्बन सोखते हैं, चरने वाले जानवर (ruminants) के पेट के बैक्टीरिया उसे मीथेन में बदलते हैं, और वह मीथेन वापस हवा में चली जाती है। इसकी तुलना आप 'जीवाश्म कार्बन' (fossil carbon) से कीजिए, जो जमीन के नीचे दबे पेट्रोल-कोयले को जलाकर पर्यावरण में अलग से थोपा जा रहा है। असली विलेन यह जीवाश्म ईंधन है, लेकिन इसे कम करने की कोई बात नहीं करता।
इतिहास का गवाह: जंगली शाकाहारी जानवर भी मीथेन छोड़ते हैं। जैसा कि मेरे सहयोगी पाब्लो मंज़ानो हमेशा याद दिलाते हैं—सदियों पहले जब दुनिया में करोड़ों की तादाद में जंगली जानवर खुले घूमते थे, तब भी वे लगभग उतना ही मीथेन पैदा करते थे जितना आज इंसानों के पाले हुए मवेशी कर रहे हैं।
विज्ञान का गलत पैमाना: मुख्यधारा का पशु विज्ञान जलवायु पर असर नापने के लिए एक बड़ा ही संकीर्ण पैमाना चुनता है—प्रति किलो मांस या दूध पर होने वाला उत्सर्जन। ऐसा करके वे पर्यावरण पर मवेशियों के 'समग्र प्रभाव' (systemic impact) को पूरी तरह नजरअंदाज कर देते हैं। अब यह प्रभाव अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी। अगर जानवर खुले में घूम-घूम कर प्राकृतिक घास चरते हैं, तो वे अपनी गतिविधियों से मिट्टी में कार्बन को सोखने (carbon sequestration) में मदद करते हैं, जो पर्यावरण के लिए वरदान है। इसके उलट, अगर आप जानवरों को बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों (बाड़ों) में बंद कर देंगे, तो उनके चारे को उगाने के लिए रसायनों और भारी मात्रा में डीजल-पेट्रोल का इस्तेमाल होगा, जिससे हवा, पानी और मिट्टी सब प्रदूषित होंगे।
खेल कहाँ बिगड़ता है: अगर आप सिर्फ 'प्रति किलो दूध या मांस' के गणित से पर्यावरण को नापेंगे, तो ये बंद और फैक्ट्रियों वाली औद्योगिक प्रणालियाँ (intensive systems) कागज़ पर ज्यादा 'कुशल' और साफ-सुथरी दिखेंगी। लेकिन अगर आप पूरे पर्यावरण और उत्पादन के तौर-तरीकों को समग्रता में देखेंगे, तो हमारी पारंपरिक और घूम-घूम कर चराने वाली व्यवस्था (mobile pastoralist system) कहीं ज्यादा पर्यावरण-अनुकूल साबित होगी।
शायद वैज्ञानिक इस 'प्रति इकाई उत्पादन' वाले भ्रामक पैमाने को इसलिए बढ़ावा देते हैं क्योंकि इसके पीछे उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों (transnational corporations) का अंधाधुंध पैसा और दबाव है जिन्हें इस औद्योगिक खेती से फायदा होता है। इनमें दुनिया के 5 सबसे बड़े अनाज व्यापारी, खाद बनाने वाली कंपनियाँ, दवा कंपनियाँ (जो एंटीबायोटिक्स बेचती हैं) और जेनेटिक्स कंपनियाँ शामिल हैं।
यहाँ तक कि 'जेफ बेजोस अर्थफंड' (Jeff Bezos Earthfund) भी इसी बहकावे में आ गया है। वे अफ्रीका की स्थानीय गायों की नस्लों में ऐसी ब्रीडिंग का समर्थन कर रहे हैं जिससे वे कम मीथेन छोड़ें और ज्यादा दूध-मांस दें। इसके पीछे सोच यह लगती है कि अफ्रीका की पारंपरिक कम दूध देने वाली गायों को हटाकर उनकी जगह मुट्ठी भर 'हाई-प्रोडक्टिविटी' वाली गायें रख दी जाएं। भले ही वे स्थानीय नस्लों पर काम कर रहे हों, लेकिन सवाल कई हैं: क्या ज्यादा दूध-मांस देने के चक्कर में इन गायों की कठिन मौसम को झेलने की ताकत (resilience) खत्म नहीं हो जाएगी? और उन गरीब चरवाहों की राय इस पूरी योजना में कहाँ है, जिनके भले का दावा किया जा रहा है?
यह सोचना ही अपने आप में हास्यास्पद और क्रूर (grotesque) है कि जो चरवाहे दुनिया में सबसे सादगी भरा जीवन जीते हैं और जिनका ग्लोबल वार्मिंग में कोई हाथ नहीं है, उन्हें तो पर्यावरण सुधारने के नाम पर निशाने पर लिया जा रहा है; जबकि असली गुनहगार—जो जीवाश्म ईंधन की ऐश-ओ-आराम वाली जिंदगी जी रहे हैं—उन पर कोई उंगली नहीं उठाता।
अब समय आ गया है कि पशु विज्ञान अपने इस पुराने ढर्रे को बदले। हमें सिर्फ 'ज्यादा उत्पादन और मुनाफे' की अंधी दौड़ से बाहर निकलना होगा। हमें एक ऐसा समग्र नज़रिया (systemic view) अपनाना होगा जो पर्यावरण के हर पहलू को देखे, न कि सिर्फ प्रति लीटर दूध पर मीथेन का हिसाब लगाए। हमें पारंपरिक चरवाहों की तरह सोचना होगा, जहाँ पशु, इंसान और प्रकृति को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक अटूट हिस्से के रूप में देखा जाता है—जिसे आधुनिक भाषा में 'वन-हेल्थ' (One-Health) दृष्टिकोण कहते हैं।
खैर, अगर दुनिया को वाकई सिर्फ मीथेन की ही इतनी फिक्र है, तो गायों को जेनेटिकली बदलने के इस उबाऊ ड्रामे को छोड़िए... क्यों न हम सारी गायों की जगह ऊँट पालना शुरू कर दें? क्या ख्याल है? :)
Grotesque is the right word for this kind of thinking and practice!
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