क्या हम लकड़ी और चूल्हे को कभी अलग कर पाएंगे?- ग्रामीण भारत की ऊर्जा सुरक्षा और नीतियों का अंतर्विरोध
2005 का एक किस्सा आज याद आ रहा है। मैंने ग्रामीण विकास के क्षेत्र में काम करना शुरू ही किया था। मैं उत्तराखंड के नैनीताल ज़िले के मशहूर फल पट्टी क्षेत्र, रामगढ के छोटे से गाँव छतोला में एक संस्था में काम रहा था। संस्था ने एक घर अपने कर्मचारियों के लिए किराये पर ले रखा था। लिहाज़ा, मुझे भी उस घर में रहने का मौका मिला। एक दिन जिस घर में मैं रहता था उसमें सुबह सुबह एक महिला आयी और उसके दालान में लगे पेड़ से कुछ टहनियां काटने लगी। हमारे पर्यावरणवादी और प्रकृति प्रेमी साथी यह देखकर बहुत आहत हुए और उन्होंने उसे ऐसा करने से रोका। विरोध करने पर वो महिला अपने पतली दुबली काया समेत उस पेड़ से नीचे उत्तरी और हमें बुरा भला कहते हुए चल दी। वो बात, वह किस्सा हमेशा मेरे मन में कहीं दबा रह गया है। वह महिला अपने घर से इतनी दूर कुछ लकड़ियों के लिए आयी थी। क्या ऐसा मान लेना सही है? क्या उसके पास सुबह सुबह ये काम करने के अलावा और कोई काम नहीं था? क्या दबाव था उसके ऊपर जो उसने ये फसाद मोल लिया। उसको भी पता होगा की ये संस्था वाले उसे रोकेंगे। फिर भी वह वहां आयी। आखिर क्यों? जब मैं मंड...