"घुटने दुखते हैं चढान में
मन लेकिन काकड़ हिरन, हृष्ट-पुष्ट नीलगाय
झकझोर जलेबी खाई, तो तुम्हें याद किया
पतलून की पेटी पर चाशनी पोंछी तो तुम्हें याद किया
दूर से मोटर रोड देखी तो तुम्हें याद किया
और तो और तुम्हें देखा, तो भी तुम्हें याद किया "
ऊपर लिखी कविता वीरेन डंगवाल जी की है। मेरे लिए यह हिंदी की सबसे सुन्दर प्रेम कविता है। और शायद हमेशा रहेगी। डंगवाल जी ने इसे शीर्षक दिया, "अधेड़ नैनीताल, उधेड़बुन '। कविता कब नैनीताल की बात करती है, और कब प्रेम की. कहना मुश्किल है। असल में ये पांच छोटी छोटी कविताओं की एक लड़ी है, जिनका एक ही शीर्षक है। मैं हिंदी भाषा का ज्ञानी या आलोचक तो नहीं हूँ। तो मुझे नहीं पता कि ये कौन सी विधा या कौन सी फॉर्म में लिखी गयीं। पर मुझे नहीं लगता इन्हें लिखते वक़्त डंगवाल जी इन कविताओं के शास्त्रीय स्वरुप के बारे में सोच रहे होंगे। जब भी इस कविता को पढता हूँ, इससे उपजती नराई (nostalgia) मेरे मन को लबालब भर देती है। प्रेम, नैनीताल और बढ़ती उम्र का मिश्रण एक अलग दृष्टि पैदा करता है। डंगवाल जी यकीनन प्रेम से सराबोर होंगे इन पंक्तियों को कलमबद्ध करते वक़्त। मुझे जो बात और ज़्यादा सोचने पर मजबूर करती है कि किस तरह प्रेम की स्मृतियाँ स्थान से बंध जाती हैं। ऐसा हज़ारों सालों से होता आ रहा है, कोई नयी बात नहीं।
राधा-कृष्ण की जोड़ी की बात हो रही है या कुंज की? क्या कुंज उतना ही महत्वपूर्ण है इस चित्र में जितने प्रेम में राधा मोहन? प्रेम में कुंज का क्या "स्थान" है?
तुलसीदास की इन पंक्तियों को देखिये। वन सुन्दर हैं, जिसे निहारने से मन सुखी महसूस करता है। राम इस वन को मुदित मन से देखते हैं। असल में तुलसीदास देख रहे हैं, प्रेम से, वन के बीच, सीता-राम को। उनके इस प्रेम में 'वन" का क्या स्थान है?
प्रेम का जंगलों, नदियों, झीलों, पहाड़ों से क्या लेना देना है? क्या प्रेम झुग्गियों में, गन्दगी में, दर्द में, कष्ट में नहीं होता? होता है। पर हम प्रेम को कष्ट से नहीं जोड़ते। अपार कष्ट में भी प्रेमी एक ऐसी जगह जाना चाहते हैं जहाँ-
जहाँ गम भी न हो, आंसू भी न हो,
बस प्यार ही प्यार पले
बताने की ज़रुरत तो नहीं पर एक बात को बार बार कहा जाना ज़रूरी है। प्रेम इंसानी ज़हन में आयी सबसे नायाब भावना है। नए शोध बताते हैं कि मानव में प्रेम करने की क्षमता मानव विकास की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी। वैसे तो प्राणी जगत में प्रेम का पाया जाना एक प्राकृतिक परिघटना है। पर प्रेम की समझ होना थोड़ा विचित्र है और यही हमें बाकी प्राणियों से अलग भी करता है। प्रेम की वैज्ञानिक व्याख्याओं में यह कुछ होर्मोनों के जटिल व्यव्हार और यौवन में हॉर्मोन्स के अधिक स्त्राव के कारण होता बताया जाता है। पर यह शरीर में होते इस केमिकल लोचे से कहीं ज़्यादा है। प्रेम करने के लिए एक समाज चाहिए होता है, एक समाज शास्त्र भी और शायद उस से महत्वपूर्ण, जिओग्राफिया भी । एक ऐसा लैंडस्केप जिसमें प्यार करने की जगह हो, जहाँ प्रेमी युगल भीड़ में भी अपनी प्राइवेसी को महसूस कर सकें और खुले आसमान के नीचे भी अपने दिल की बात कर सकें। प्रेम करने के लिए स्थान भी चाहिए।चाहे वो मुंबई का बैंडस्टैंड हो या दिल्ली का लोधी गार्डन या नैनीताल की झील के किनारे या झील को घेरे जंगल । प्रेम प्रकृति और समाज के मेल से बने स्थानों में फलता-फूलता है। कॉमन्स या सामुदायिक संसाधन सिर्फ आजीविका के लिए महत्वपूर्ण नहीं हैं, प्रेम के लिए भी अपरिहार्य हैं।
प्रेम की बुनियाद हमारी स्मृतियों में पड़ी होती है। एक सुन्दर लैंडस्केप की सालों से संजोई याद प्रेम में पूरे जीवन एक चिंगारी को जलाये रखता है। किताबों के बीच सहेजे सूखे हुए फूलों की तरह प्रेम की स्मृतियाँ आर्काइव की जाती हैं। अनगनित फोटुओं में क़ैद स्मृतियाँ। और उन स्मृतियों में बसा वह स्थान। कोई जंगल, कोई नदी, किसी झील का किनारा। कोई पहाड़ की चोटी , कोई रास्ता, कोई पार्क या कोई पुरानी इमारत ही हो । कहना मुश्किल है कि क्या प्रेम प्रकृति के प्रति लगाव पैदा करता है या प्रकृति प्रेम की प्रेरणा देती है।
क्या ऐसा है इन जगहों में जो यहाँ प्रेम पल्लवित हो पता है? इन स्थानों को प्रेम अपने लिए कैसे चुनता है? कैसे हमें पता लगता है कि यह स्थान प्रेम के लिए उपयुक्त है?
प्रेम के सबसे प्रचलित स्थानों में मेले भी शामिल हैं। मेले यकीनन सामुदायिक जगहों पर ही लगाए जाते रहे हैं। अपने अंदर भीड़ समेटे मेले प्रेमियों को एक सामाजिक पर्दा दे देते हैं और समाज के बंधनों से मुक्त होने की एक जगह मुहैया कराते हैं। अमीर-गरीब, जाति के बंधनों को लांघने की संभावना पैदा करते हैं। आकर्षण के नियमों को समाज के बनावटी नियमों की रोकटोक के बिना अपना काम करने देने स्वंत्रता देते हैं। मेलों में सब कुछ है जो प्रेम की गुंजाइश पैदा करता है। खूब सारी रौशनी, रोमांचित करने वाले झूले, स्वाद, खेल- सुंदरता और रोमांच के वह सारे मसाले जो मन को प्रेम के लिए आवश्यक उत्सुकता प्रदान करते हैं। मध्य प्रदेश के झाबुआ के भगौरिया मेले के बारे में आपने सुना होगा। होली से पहले होने वाले इस मेले में प्रेमियों को मिलने इजाज़त है। वह एक दूसरे को पसंद करते हैं, गुलाल लगाते हैं और पान का बीड़ा देकर अपने प्रेम का इज़हार करते हैं। मेले प्रेम को पनपने देने के लिए एक महत्त्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर हैं।
समाज के भीतर एक द्वन्द चलता रहता है। प्रेम को कितनी जगह दी जाये। जो समाज आम तौर पर प्रेम की राहों में हज़ार रोड़े अटकाता है, वही समाज, ऐसी कई खिड़कियां खोले रखता है जहाँ प्यार पनप पाए। बस्तर, गढ़-चिरोली के क्षेत्र में गोंड आदिवासियों के बीच 'घोतूल' व्यवस्था होती है। गाँव के अंदर ही यह एक हॉस्टल जैसी व्यवस्था होती है जहाँ गाँव के नौउम्र लड़के-लड़कियां एक साथ रहते हैं । इस समय जब इन युवाओं में यौन होर्मोन का स्त्राव अपने चरम पर होता है, ऐसे समय में ये युवा सामाजिक कार्यों में हाथ बंटाते हैं और जीवनसाथी भी चुनते हैं। आदिवासी समाज असल में बाकी समाजों से प्रेम की समझ के सम्बन्ध में कहीं आगे हैं। औरों को उनसे सीखना चाहिए। हालाँकि आदिवासियों में प्रेम के लिए इतनी ऊंची दर्जे की व्यवस्था बाकी समाजों के लिए एक नज़ीर होनी चाहिए थी। हमारी घटिया सोच ने 'घोतूल' को भी हाशिये पर ला दिया है, वहीं जहाँ हमने बाकी कॉमन्स को भी रख छोड़ा है। घोतूल भी एक कॉमन्स है, प्रेम के लिए एक आवश्यक कॉमन्स।
हम सामाजिक कार्यकर्ता लोग गाँव के लोगों की विकास में भागीदारी सुनिश्चित करने को अपने काम का एक महत्वपूर्ण इंडिकेटर मानते हैं। सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं को PRA करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है, जिसकी मदद से वह गाँव के लोगों के साथ कुछ नक़्शे बनाएं, उन नक्शों के अंदर सामाजिक विषमताओं के पैटर्न खोजें, और समाज में बराबरी की भावना लाने के लिए एक माहौल पैदा करें। धीमे धीमे PRA एक प्रथा बनती जा रही है, जिसमें कोई रस नहीं है, सिर्फ निर्देश हैं। युवाओं की भागीदारी ऐसे में मुश्किल होती जा रही है। क्यों नहीं हम बाकी नक्शों की तरह गाँव का एक "लव-मैप" भी बनाते? युवा ऐसी प्रयोग से शायद खींचे चले आएंगे। जिस समाज में प्रेम की बात सार्वजनिक रूप से करने का आईडिया ही अपने आप में लज्जाजनक (scandalous) हो, वहां लव मैप तो एक विकास का एक बिलकुल नया आयाम पैदा कर सकता है। हो सकता है कि समाज इसे स्वीकार न करे। पर हम ये क्यों न सोचें कि यदि स्वीकार कर लिया तो क्या क्या संभव हो जाएगा ?
प्रेम एक बहुत शक्तिशाली भावना है। यदि प्रेम देश से हो तो देश-प्रेम कहलाता है। और यदि यही प्रेम प्रकृति से हो तो प्रकृति प्रेम भी कहलाया जा सकता है। हाल ही में हमने देखा कि देहरादून में "प्रकृति-प्रेमियों" के विरोध के कारण सरकार ने कई हज़ार पेड़ों की कटाई के अपने घृणित प्लान को टाल दिया है। ऐसे कई मामलों में हमें प्रेम की असली ताकत दिखाई देती है। असल में प्रकृति-प्रेमी ही प्रेम को सही मायने में समझ सकते हैं। या प्रेमी मन ही प्रकृति के प्रति प्रेम रख सकता है। एक द्वेषपूर्ण मन तो क्या ही किसी की कदर करेगा। प्रकृति को तो भूल ही जाइये। इसीलिए मैं जब मैं पेड़ लगाते, जंगलों में पक्षियों को ढूंढते, या जंगल काटने से बचाते प्रकृतिवादियों को देखता हूँ, तो मुझे उनमें प्रेम की अपार संभावनाएं दिखाई देती हैं।
प्रकृति हज़ारों सालों से जिस परफेक्ट मानव के जैव विकास का प्रोजेक्ट चला रही है, प्यार करने वाले उसी का एक हिस्सा हैं।इंसान का विकास उसकी बुद्धि के विकास के साथ ही नहीं जुड़ा है, उसके प्रेम करने की क्षमता से भी जुड़ा है। कॉमन्स वह लैब हैं जहाँ मानव समाज इस प्रोजेक्ट में प्रकृति का साथ देते दिखाई देते हैं। मुझे लगता है कि "होमो सेपियन्स" को असल में "होमो लविंग सेपियन्स" कहना चाहिए और प्रेम ने जैव विकास के क्रम में जो महत्वपपूर्ण भूमिका निभाई है, उसे बाहर लाना चाहिए। बताना चाहिए कि सिंधु घाटी, मिस्र, चीन या रोमन सभ्यताओं में मनुष्य ने प्रेम के लिए कौन से "कॉमन्स बनाये या ऐसी क्या व्यवस्थाएं बनायीं जिन्होंने "कॉमन्स फॉर लवर्स" को जिन्दा रखा। यह सब इतिहास के विद्यार्थियों को पढ़ाया जाना चाहिए। टाउन एंड कंट्री प्लानिंग, या आर्किटेक्ट को ऐसे गाँव या शहर बनाने के लिए प्रेरणा मिलनी चाहिए जहाँ प्रेमियों को कॉमन्स आसानी से उपलब्ध हों।
हमारे रचनाकार, कवि, दार्शनिक हमारे समाज के सरमाये हैं। मेरी इल्तिजा है कि हम लोग उनकी बात ध्यान से सुनें। बात ख़त्म करते हुए मन कर रहा है परवीन शाकिर का कहा एक शेर यहाँ छोड़ जाऊं, जो मुझे हमेशा याद आता है जब भी मैं बरसात से भीगे जंगलों की सौंधी महक महसूस करता हूँ -
तेरी चाहत के भीगे जंगलों में
मेरा मन मोर बनके नाचता है
Very beautifully penned
ReplyDeleteVery nicely expressed.
ReplyDeleteExcellent
ReplyDeleteBahut sundar aur behad sateek!
ReplyDeleteMera mann kiya ki isme ilahabad ke company bagh ka naam bhi aa jaata kahin.....gunahon ka devta me chandar aur uska premi mann aksar company bagh me paaye jaate the...ab vahan bhi 5 Rs. Ka ticket laga diya hai sarkar ne. Ab vahaan yuwa pratiyogi chaatr bahut kum aate hain...unki jagah ab apni chamakti car leke sheher ke tamaam "uncles and aunties" morning walk karne aate hain. Ek cheez jo abhi bhi puraani bachi hai..wo hai Chandrashekhar Azad ki pratima, wahaan jahaan unhone apni akhiri saans li thi...ek jaamun ke ped ke niche...usi ped ne unko bhi panaah di thi angrezon ki bandook se bachne me.
thanks for sharing your memories Abhishek
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