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देशी वन प्रबंधन बनाम औपनिवेशिक वन प्रबंधन - 1

researchgate से साभार Designing multifunctional forest systems in Northern Patagonia, Argentina

कुछ समय पहले में इंडियन पीनल कोड का नाम बदल कर भारतीय दंड  संहिता किया गया। कहा गया कि ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि  औपनिवेशिक काल की स्मृतियों को और उसकी हमारे कानून पर पड़ी छाप को कम किया जा सके। पर औपनिवेशिक काल का साया सिर्फ भारत की दंड संहिता पर ही नहीं है। ऐसी बहुत सी व्यवस्थाएं हैं जिनमें बहुत गहरे औपनिवेशिक काल की सोच और दृष्टि पैठी हुयी है जिनके तले  इस देश का मूल ज्ञान और व्यवस्थाएं दबी पड़ी हैं। हमारे देश में कम से कम 35 करोड़ लोग ऐसे हैं जो एक और औपनिवेशिक विचार से उपजी व्यवस्था से हर रोज़ जूझ रहे हैं।ये व्यवस्था है हमारे वनों का प्रबंधन।हमारे वन प्रबंधन और वन कानून भी उसी औपनिवेशिक सोच से सराबोर हैं । और यह सिर्फ कानून बदलने का मामला नहीं। ज़रुरत है, वो सोच बदलने की जो हमारे जंगलों के प्रबंधन के पूरी प्रणाली के हर हिस्से को व्यवस्थित करती है। 

वन प्रबंधन हमारे देश में एक कानून व्यवस्था का मामला बना दिया गया है। 19 वीं सदी के उत्तरार्ध में देश का वन विभाग अस्तित्व में आया, हमारे वनों का दोहन करने के लिए।  वन प्रबंधन को मार्गदर्शित करने के लिए आज भी जिस विद्वान की किताबों और विचारों  को गीता जैसा दर्जा प्राप्त है, उनका नाम है  इम्पीरियल फारेस्ट डिपार्टमेंट के जनक डीट्रिख ब्रांडिस  (Dietreich Brandies)।  ब्रांडिस ने उन्नीसवीं सदी में बर्मा (अब म्यांमार) के सागौन के जंगलों को प्लांटेशन में बदलने के प्रयासों से अपना करियर शुरू किया। उन्होंने एक ऐसी व्यवस्था बनायीं जिससे वहां के आक्रामक आदिवासी भी वहां के वन विभाग की व्यवस्था पर निर्भर हो गए और वनों के सरकारी प्रबंधन के प्रति उनका विरोध कमजोर पड़ गया। वहीं उन्होंने सागौन के जंगलों के प्रबन्धन और व्यवस्थापन पर शोध किये और सागौन वृक्षों की देखभाल, उनसे इमारती लकड़ी के उत्पादन, प्लांटेशन की उत्पादकता (प्रोडक्टिविटी), पेड़ों की वृद्धि दर और उनकी कटाई की दर, प्लांटेशन के प्रबन्धन के लिए नियमावली  जैसे कई महत्वपूर्ण दस्तावेजों और आंकड़ों को उनके शोध ने जन्म दिया। बाद में यही काम आधुनिक या कहिये, औपनिवेशिक वानिकी (कोलोनियल फॉरेस्ट्री) की नींव साबित हुए। भारत में आकर ब्रांडिस वन विभाग से जुड़ गए , जिसे तब "इम्पीरियल फारेस्ट डिपार्टमेंट" कहा जाता था। 1864 से 1883 तक वे वन विभाग के इंस्पेक्टर जनरल रहे। उनके कार्यकाल के समाप्त होते ही भारत को अपना भारतीय वन कानून 1885 मिला, जिसके मसौदे को तैयार करने में उनकी बड़ी भूमिका थी। ब्रांडिस साहब ने  भारत में पहले वानिकी स्कूल की सस्थापना की जिसे उस समय "इम्पीरियल फारेस्ट स्कूल" कहा गया, जिसे आज हम फारेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट, देहरादून के नाम से जानते हैं। इसी इंस्टिट्यूट में आज भारतीय वन सेवा के अफसरों का प्रशिक्षण होता है। 2014 में ब्रांडिस के आई. जी. फारेस्ट बनने के 150 साल पूरे हुए। भारतीय वन विभाग ने इस मौके पर कई कार्यक्रम आयोजित किये। उन्हें देश का पहला फोरेस्टर कहा गया। पर क्या भारत में उनसे पहले वनों का जानकार कोई न था? क्या किसी को यह समझ नहीं थी कि  जंगलों के संरक्षण कैसे होता है? 

हालाँकि ब्रांडिस साहब ने कई देव वनों और स्थानीय समुदायों और वन प्रबंधन के रिश्तों पर भी काम किया है पर उनका मुख्य योगदान जंगलों को लोगों से अलग करने और भारतीय वन प्रबंधन की परम्पराओं से विमुख करने में ही रहा है। जैसा कि हमने पहले बताया, ब्रांडिस को ख्याति ही बर्मा के आदिवासी समाजों को जंगल से अलग करके और वहां जंगलों को एक वृक्ष वाले प्लांटेशन में बदलने से मिली थी।  ब्रांडिस को हम वन प्रबंधन के मैकाले की संज्ञा दे सकते हैं। जैसे मैकाले ने भारत की शिक्षा पद्यति को हमेशा के लिए बदल दिया, उसी तरह ब्रांडिस ने भारत के कई हिस्सों में प्रचलित वन प्रबंधन की पद्धति को तहस नहस करके उसपर एक औपनिवेशिक सोच वाले वैज्ञानिक प्रबंधन को थोप दिया।  औपनिवेशिक वन नीतियों के लागू होने से लाखों वनवासी और आदिवासी अचानक अपने ही घर में पराये हो गए। हमारे करोड़ों घुमन्तु पशुपालक, हमारे वनवासी और आदिवासी समाज, मछुआरे, उत्तर पूर्व के आदिवासी समाजों का हज़ारों सालों से संचित ज्ञान को हाशिये पर धकेल दिया गया और इस बदलाव ने एक ऐसे "ऐतिहासिक अन्याय" को जन्म दिया जो आज भी अबाध गति से जारी है। 

ऐसा नहीं है कि अंग्रेज़ों के आने से पहले भारत में वन प्रबंधन नहीं होता था। भारत के  देशी वन प्रणाली  हमारे ही देश के लाखों गाँवों में विकसित हुई। जो  ज़रुरत और प्राकृतिक स्थितियों के हिसाब से हमारे वनवासी समाज विकसित करते रहे। इस लेख के लिए हम इस देशी वन प्रबंधन कह रहे हैं। पर ये देश के उत्तर से दक्षिण तक और पुरब से पश्चिम तक बदलती रहती है। राजस्थान के मरुस्थल से लेकर मेघालय, नागालैंड के जंगलों तक, समुदायों ने, स्थानीय स्थितियों के अनुसार इस प्रणाली को शक्ल दी है। बस एक बात सब में सामान है। लोगों के संगठन, सामाजिक जुड़ाव और स्थानीय पारिस्थितिकी (इकोलॉजी) और परिस्थितियों की समझ  बाहरी व्यक्ति के अंदर होना बहुत ही मुश्किल है।  

देशी वन प्रबंधन कैसे होता है 

पिछले कुछ वर्षों में देशी वन प्रबंधन पद्धतियों पर काफी शोध हुआ है।  80 के दशक में नरपत सिंह जोधा ने देश के सामुदायिक संसाधनों के प्रबंधन के पद्धति पर बहुचर्चित शोध किया जोकि आज भी देश में देशी वन प्रबंधन के विमर्श की नींव को मज़बूत बना रहा है। चलिए हम देशी वन प्रबंधन कैसे किया जाता है, इस पर चर्चा करें। इस लेख के आगे के भाग में हम इस के कुछ पहलूओं  को छूने की कोशिश करेंगे। ऐसा करने के लिए हमने इस ज्ञान को कुछ श्रेणियों में बांटा है।  जैसे, जंगल की निगरानी, आग से जंगल को बचाने में समुदायों की भूमिका, लैंडस्केप से सम्बंधित गूढ़ ज्ञान, उसकी जैव विविधता बढ़ाने सम्बंधित कार्यवाहियां, चराई से होने वाला संरक्षण आदि।  लेकिन ये सिर्फ एक कोशिश भर है, इस अगाध ज्ञान को एक ढाँचे में डालने की। ऐसे कई और प्रयास हो सकते हैं तब भी शायद ये समुद्र में से घड़ा भर पानी निकाल लेने जैसी कोशिश से ज़्यादा कुछ नहीं। 

1. जंगलों की निगरानी करती हज़ार आँखें 

जब औरतें और पुरुष जंगल जाते हैं तब वह सिर्फ वहां से लकड़ी चारा या वनोपज नहीं लाते। वह जंगल में होने वाली हर गतिविधि के गवाह भी हो जाते हैं। वे समझ जाते हैं कि जंगल में क्या हुआ है।  यह वन विभाग का  कोई नौकरीशुदा गार्ड कभी समझ ही नहीं सकता। वे पहचानते हैं कुल्हाड़ी और आरी की आवाज़ में फ़र्क़, जानवरों की खुरों के निशान और उनके मल की पहचान, जंगल में उगते नए पौधे और न जाने क्या क्या। उनसे बेहतर पेट्रोलिंग कोई नहीं कर सकता है और वह भी बिना किसी लागत के। ग्राम समुदाय अपने सामाजिक बंधनों पर आधारित एक ठोस सूचना तंत्र बना लेते हैं जो वन के उपयोग सम्बन्धी स्थानीय और परंपरागत नियमों को लागू करने में सक्षम होता है। वो सिर्फ पेड़ नहीं गिनते। वे देखते हैं की कहाँ नए वल्मीक आ रहे हैं,  कहाँ पानी है, कहाँ घास है, पक्षी, मधुमक्खियों के छत्ते और न जाने क्या क्या। जंगल की स्थिति में होता हल्का सा बदलाव भी उनकी नज़र से छिपता नहीं। निगरानी के कई अनकहे और अलिखित कोड होते हैं, जिन्हें स्थानीय लोग ही समझते हैं। 

देश के कई भागों में लोग आज भी अपने जंगलों की रक्षा करते हैं। ओडिशा के सैकड़ों गाँव के लोग अपने जंगल की गश्त लगाने के लिए बारी बारी से जाते हैं। इस व्यवस्था को "ठेंगा पाली" कहा जाता है। ठेंगा का मतलब लाठी और पाली का मतलब बारी। गाँव का हर परिवार बारी बारी से जंगल का पहरा देता है। (https://indiacurrents.com/thengapalli-women-climate-heroes-protecting-odisha-forests/)   यह बिना किसी खर्च की एक सुन्दर व्यवस्था है, जो गाँव और जंगल को जोड़े रखती है। ऐसी ही व्यवस्था भारत के बहुत से क्षेत्रों में आज भी व्यवहार में हैं। वानिकी की आधुनिक शब्दावली इसे सोशल फेंसिंग यानी 'सामाजिक बाड़ाबंदी या रुंधाई ' भी कहा जाता है। पर जैसाकि हमने पहले ही कहा, यह आधुनिक वानिकी की देन नहीं है।  

आधुनिक वन प्रबंधन इस व्यवस्था को न तो समझता है और न इसकी सहायता लेता है।  वह एक तनख्वाह प्राप्त गार्ड के सहारे इस काम को करना चाहते हैं। पर एक ओर तो बचे खुचे वनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना एक बड़ा सर दर्द बनता जा रहा है, और दूसरी ओर वन विभाग संसाधनों की भारी कमी से जूझ रहा है। ऐसे में समुदायों की संचित शक्ति ही अब वनों को बचाये हुए है। वन विभाग अपनी ताक़त ज्यादातर अभयारण्यों के संरक्षण में लगा रहा है जो कि देश के कुल क्षेत्रफल का लगभग 5. 28 प्रतिशत है, और कुल वनक्षेत्र के लगभग 25 प्रतिशत। बाकी वनक्षेत्रों में संरक्षण के लिए समुदायों और वन विभाग के बीच समन्वय अनिवार्य है। 

2. सूखी लकड़ियों को हटाती महिलाएं 

आम तौर पर जलावन की लकड़ी सूखी ही बेहतर होती है। यह बात सब जानते हैं।  सूखी और गिरी पड़ी लकड़ियों को उठा कर जंगल में आग का खतरा कम होता है। जब  वन क्षेत्रों में लोगों का आना जाना कम होता है, वहां यह लकड़ियां ईंधन की तरह इकट्ठी होती रहती हैं और मौसमी परिवर्तन के समय बड़ी तेज़ी से भयानक दावानल का कारण बनती हैं। यदि हम दूसरे तरीके से सोचें और लोगों को मज़बूर करें लकड़ी न इस्तेमाल करने के लिए तो वो क्या करेंगे? उन्हें आपको विकल्प के रूप में कोई जैविक ईंधन, जैसे कोयला या रसोई गैस देनी पड़ेगी।  लकड़ी उसके मुक़ाबले में सस्ता और कम नुकसानदेह ईंधन है क्योंकि उससे होने वाला कार्बन उत्सर्जन रसोई गैस को का उत्पादन करने, बनाने, परिवहन करने और उसके जलने से होने वाले उत्सर्जन से कहीं कम होता है। और हज़ारों साल से जो कार्बन जमीन के नीचे दबा पड़ा था, उसे बाहर लाकर वायुमंडल में छोड़ता है सो अलग। हालाँकि किसी अक्षय ऊर्जा के विकल्प के मुक़ाबले शायद लकड़ी घातक हो, पर कोयले, गैस और तेल के मुक़ाबले तो हम बहुत यकीन से इस बात को कह सकते हैं। खैर अगर हम इस बात को छोड़ भी दें, तो भी 2021 के NSSO सर्वेक्षण के अनुसार देश में एक तिहाई से अधिक घरों में सिर्फ लकड़ी का उपयोग ईंधन के रूप में होता है और ग्रामीण इलाकों में तो ये आंकड़ा 47% है । Dhruvika Dhamija (2023), “How many Indian households use clean fuel for cooking?” Centre for Economic Data and Analysis (CEDA), Ashoka University. Published on ceda.ashoka.edu.in 

 उससे भी कहीं अधिक संख्या में ऐसे भारतीय परिवार भी हैं जो एक से ज्यादा प्रकार के ईंधन का इस्तेमाल करते हैं, जिसमें लकड़ी भी शामिल होती है।  मुझे नहीं लगता की लाख चाहने के बावजूद, हम हम लकड़ी का उपयोग कम करने की दिशा में कोई उल्लेखनीय प्रगति का पाएंगे। उनपर लकड़ी का इस्तेमाल न करने का दवाब बनाने से एक नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। लकड़ी इकठ्ठा करते समय महिला-पुरुष पकडे जाने के डर के कारण जल्दीबाजी में जंगल को ज़्यादा नुक्सान पहुंचा सकते हैं। जो अन्यथा वह शायद नहीं पहुंचाते। यदि उनके मन में डर न हो तो शायद वह उसी लकड़ी को ले जाएँ जिसकी ज़रुरत है या सूखी लकड़ी को इकठ्ठा करने का काम इत्मीनान से कर पाएं। 

भारत में आक्रामक झाड़ियों के बढ़ते असर से (जोकि औपनिवेशिक वानिकी की एक और नकारात्मक सौगात है ) जो नुक्सान हो रहा है, उसमें भी ये बहुत ज़रूरी है कि लोग आक्रामक झाड़ियों और प्रजातियों का कोई बड़ा उपयोग ढूंढ लें जिससे इनसे होने वाले नुक्सान को कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।  मैंने देखा है कि मध्य प्रदेश के मंडला में लैंटाना एक प्रमुख जलावन की लकड़ी का स्रोत बन चुका है।  ऐसे ही विलायती बबूल (प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा) राजस्थान और गुजरात में चारकोल बनाने के काम में लिया जा रहा है। ये सब बदलाव समुदायों की सहज बुद्धि से हमें प्राप्त हुए न कि औपनिवेशिक वानिकी से। इसी तरह लोग जानते हैं कि कौनसे पेड़ पौधों की लकड़ी जलावन के लिए बेहतर होती है। समुदाय पारम्परिक रूप से ऐसे पेड़ों की पहचान कर के उनका संरक्षण करते रहे हैं। पर औपनिवेशिक वानिकी ऐसे पेड़ों के बजाय इमरती लकड़ी वाले पेड़ों को ही ज्यादा तरजीह देती रही है।  अभी भी सरकारी  नर्सरी में सबसे ज़्यादा सागौन, शीशम या अन्य  ऐसे इमरती लकड़ी देने वाले पेड़ ज्यादा होंगे। अपने प्लांटेशन को लोगों की भागीदारी के बिना करने के कारण उनमें एक बड़ी चिंता होती है कि गाँव के लोग उनके पौधों को मवेशियों को चरा देंगे। तो वो ऐसे पौधे लगते हैं जिनको न मवेशी चारा सकें न ही वो अच्छी जलावन की लकड़ी दे सकें।  उदाहरण के लिया मध्य प्रदेश में करंज के, पलाश के पेड़ बहुत लगेंगे  या फिर पहाड़ में सुरई के पेड़ भी बहुत लगेंगे जिनकी लकड़ी जलावन के लिए बिलकुल अच्छी नहीं मानी जाती और बहुत धुआं देती है। 

एक और गौर करने लायक बात है समुदायों के द्वारा प्रयोग में लाये जाने वाले औजार। लकड़ी या चारा इकठ्ठा करने की प्रक्रिया में महिलाएं आम तौर पर एक हंसिया लेकर जाती हैं। इमारती लकड़ी के लिए पुरुष आमतौर पर कुल्हाड़ी लेकर जाते हैं।  आपने आरी या बिजली से चलने वाली चैनसॉ ले जाते किसी स्थानीय व्यक्ति को देखा है? वह माफिया का औजार होता है, लोगों का नहीं। 

3. चराई करते मवेशी 

 पिछले 100 सालों  में एक तो हमने हमारे वन आधारित समाजों को खेती की तरफ धकेला है, साथ ही उनके मवेशियों को खलनायक की तरह पेश किया है। वैज्ञानिक प्रबंधन में मवेशियों के प्रति घृणा तीन-चार धारणाओं के कारण है। उसमें पहली है कि वह चारे के लिए जंगली जानवरों से प्रतियोगिता करते हैं। दूसरी, हार्डिन के शोध में व्यक्त किया, कि अत्यधिक चराई के दबाव से चरागाह का संतुलन बिगड़ जाता है  और उसकी उत्पादकता घट जाती है। आज हम सभी जानते हैं कि हार्डिन का यह शोध गलत मान्यताओं पर आधारित था। मसलन हार्डिन ने  इस बात का ध्यान ही नहीं रखा कि चरवाहे आपस में बात करके अपनी समस्यायें हल कर सकते हैं। तीसरी धारणा मानव-वन्य जीव  टकराव के रूप में सामने आती है। यह कहा जाता है कि पशुओं की खुली चराई से या पशुओं के लिए चारा इकठ्ठा करते समय पशुपालक वन्य जीवों के संपर्क में  आते हैं। इससे उनके बीच टकराव की स्थिति पैदा होती है, जो वन्य जीवों के प्रति घृणा को जन्म देती है। इस बात को नकारा तो नहीं जा सकता पर क्या इसके साथ साथ  यह बात नहीं होनी चाहिए कि पिछले 150 सालों के इतिहास में वन व्यवस्था जबकि यह बात भी बिलकुल साफ़ है कि मवेशी जंगल में जंगली जानवरों के आसान शिकार के रूप में भी एक भूमिका अदा करते हैं जिसके बिना आज कई मांसभक्षी जानवर अब जीवित ही नहीं रह सकते। नौजवान बाघ और बूढ़े बाघ, दोनों ही वयस्क बाघों का मुक़ाबला नहीं सकते इसलिए उनके इलाकों से दूर रहते हैं। ऐसे में उन्हें अभयारण्यों के बफर जोन में जाना पड़ता है। मवेशियों का आसान शिकार करके ही कई  बाघ समय बिताते हैं। इस तरह इंसानी बस्तियों का  होना सिर्फ इंसानों के लिए नहीं, जानवरों के लिए भी आवश्यक हो जाता है। 

चराई करते मवेशी सिर्फ जंगल से लाभान्वित नहीं होते हैं। वे उसको वापस भी देते हैं बहुत कुछ। पहली चीज़ जो वे देते हैं वह है गोबर जो जंगल की मिटटी को उर्वर बनाने का एक मुख्य कारक है। इसके अलावा मवेशी खर पतवार और अपने खुरों से मिटटी की पानी  क्षमता को भी बढ़ाते हैं।

मवेशियों के  गडरिये भी जंगल के प्रबंधन में बहुत महत्वपूर्ण  भूमिका अदा  करते हैं। जिन गावों में  एक गडरिये की व्यवस्था है, और वही  मवेशियों को चराने लेकर जाता है, वह ऐसी बहुत सी बातों का ध्यान रखता है जिनसे जंगल को कई लाभ होते हैं। आपने देखा होगा मवेशियों के साथ चलने वाले गडरिये या तो डंडा रखते हैं और बारिश में अपने पास वह एक छाता भी रखते हैं। उसके अलावा कइयों के पास एक बांसुरी और कुल्हाड़ी भी होती है। बारिश के दिनों में छाता सिर्फ छाँव देने के नहीं बल्कि उसकी नोंक से खर पतवार निकालने के काम आता है। जंगल कोई इस निंदाई की लगातार ज़रुरत होती है। आजकल चूँकि ये काम कम हो गया है तो हम जंगलों में कई आक्रामक झाड़ियों के हमले को देख रहे हैं , जैसे गाजर घास, लैंटाना आदि।  

गडरिये एक और बहुत महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। वह मवेशियों को हमेशा अलग अलग रास्तों से जंगल में लेकर जाते हैं। इसी को रोटेशनल ग्रेजिंग कहा जाता है। ऐसा करने से जंगल को आराम करने का मौका मिल जाता है। साथ ही जंगल के हर हिस्से से खर-पतवार का नियंत्रण और गोबर खाद का वितरण भी स्वतः ही हो जाता है। अफ़्रीकी आदिवसियों के इसी काम को समझते हुए एलन सेवरी नामक एक जर्मन वैज्ञानिक ने तो सूखे क्षेत्रों के चरागाहों के पुनर्स्थापन के लिए एक प्रक्रिया को डेवेलप किया है जिसे वह "होलिस्टिक ग्रेजिंग मैनेजमेंट" कहते हैं।  वह यह दावा करते हैं कि इससे क्लाइमेट चेंज जैसी बड़ी समस्याओं का भी निदान हो सकता है।  

औपनिवेशिक वन प्रबंधन मवेशियों और छोटे पशुओं को एक समस्या के रूप में देखता था और आज भी उनको जंगल पर "प्रेशर" की तरह उन्हें बदनाम किया जाता है।  देखें तो ये मवेशी और  जंगली जानवरों के बीच चारे को लेकर होने वाली प्रतियोगिता को थोड़ा बढ़ा चढ़ा बताया  जाता है। 

 4. जैव विविधता पूर्ण जंगल 

सामुदायिक जंगल मात्र पेड़ों के लाइन से हुए प्लांटेशन की तरह नहीं दीखते हैं।  उनमें कई प्रजाति के पेड़ों के साथ साथ और बहुत सी झाड़ियाों और घास की भी संभावना  होती है।  यदि आप ध्यान से एक सामुदायिक जंगल को देखेंगे तो वह आपको एक वैज्ञानिक रीति से प्रबंधित जंगल से बिलकुल भिन्न मालूम पड़ेगा। उसमें अलग-अलग उम्र के सैकड़ों पेड़ होंगे। उसमें कूप कटाई जैसी कोई प्रक्रिया नहीं होगी। लोग अपनी ज़रुरत के हिसाब से एक पेड़ जंगल के किनारे से लेंगे और एक कहीं थोड़ा  अंदर से लेंगे। अधिकतर पेड़ों को जड़ से नहीं काटा जायेगा उखाड़ा नहीं जाएगा। कई पेड़ों की सिर्फ डगाल काटी जाती है। यदि सरकारी प्रबंधन के जंगल हम देखेंगे तो उनमें हमें हिमालयी क्षेत्र में चीड़ के जंगल दिखाई देंगे। जबकि मध्य भारत में सरकारी जंगलों में सागौन भरा हुआ है जिसके पारिस्थितिक महत्त्व को लेकर और उसके आजीविका से सम्बन्ध को लेकर बहुत बड़ा सवालिया निशान है। दक्षिण में तो सरकारी और वैज्ञानिक प्रबंधन के जंगलों में तो नीलगिरि या उकेलिप्टिस जैसे नुकसानदायक पेड़ों के जंगल खड़े किये हैं। जब इन मूर्खताओं को लेकर सालों तक शोध छपते रहे, तब वृक्षारोपण  कार्यकर्मों में जिन्दा रहने के नाम पर पिछले २०-३० सालों में ऐसे पेड़ों को लगाने का काम किया गया जिन्हें स्थानीय समुदाय इस्तेमाल नहीं करते। उदाहरण के लिए  करंज, और पहाड़ में बोले तो सुराई के पेड़ों को बहुत बड़ी संख्या में लगाया गया। इन पेड़ों की लकड़ी को जलावन के लायक नहीं माना जाता, और न ही इनके पत्ते मवेशी खाते हैं। इसके विपरीत अगर हम भारतीय समाजों के सामुदायिक प्रबंधन को देखेंगे तो उसमें हमें काफी फलदार पेड़ मिलेंगे। ओडिशा के पूर्वी घाटों वाले क्षेत्र में, जिसमें रायगड़ा और कोरापुट जिले आते हैं, उसमें आपको जंगलों में आम के, कटहल के, और बहुत से फलदार पेड़ मिलेंगे। मंडला के आदिवासी जिसे अच्छा जंगल कहते हैं उसको एक बड़ा सुन्दर नाम देते हैं। वह है "सतकठा का जंगल" यानी जिसमें सात तरह की लकड़ी या सात तरह के पेड़ हों। यहाँ "सात" एक रूपक है विविधता का।  एक ऐसा जंगल जिसमें इमरती लकड़ी हो, खेती में काम आने वाली लकड़ी ह भी हो, बांस हो, जलावन की लकड़ी हो और जो फल फूल, और पत्तों से भरपूर हो।  इसके विपरीत आप औपनिवेशिक या वैज्ञानिक प्रबंधन को देखिये और उसमें दिए जाने वाले वर्णन में क्या इतनी सुन्दर शब्दावली है ? क्यों हम सतकठा जंगल की भावना को अपने वनों के प्रबंधन में जगह नहीं देते?

5. पूरे भूदृश्य (लैंडस्केप) की समझ के आधार पर प्रबंधन 

उत्तराखंड के मध्य हिमालयी क्षेत्रों में पहाड़ियों की उत्तरी ढलानें आम तौर पर जंगल से भरी होती हैं और दक्षिणी ढलानें घास और चारे से भरपूर। स्थानीय समुदाय इस तरह के भूदृश्य को आपसी समझदारी से एक दूसरे से बांटते आये हैं। यह बात भू-दृश्य को सिर्फ ज़मीन के टुकड़ों के रूप में देखने वाले औपनिवेशिक जमीनी बंदोबस्त को समझ नहीं आ सकती। दुःख इस बात का है कि आज़ादी के 75 साल बाद भी हम अपने ही लोगों की गहरी भू-दृश्य समझ को दरकिनार करते आये हैं। ओडिशा के कई गाँवों में मैंने देखा है कि लोग जंगलों को वहां की मिटटी के हिसाब से समझते हैं। वे बता पाते हैं कि क्यों जंगल के एक भाग में ज्यादा जैव विविधता है और दूसरों में कम। इसी तरह मध्य प्रदेश के कई गाँव एक ही बड़े जंगल को आपसी समझ के अनुसार आपस में बांटते हैं।  इस तरह यह प्रबंधन, आधुनिक प्रबंधन द्वारा की गयीं हज़ारों चोटों के बावजूद अभी भी खड़ा है जो अपने आप में बड़ी बात है। 

इसी तरह पूरे भूदृश्य पर ध्यान की बात ओडिशा के नियमगिरि के रहने वाले डोंगरिया कोंध आदिवासी भी करते हैं। फेलिक्स पडेल नाम के प्रख्यात मानव विज्ञानी ने अपने शोध में आदिवासियों के उनके "नियाम राजा" से सम्बन्ध को दर्शाया है।  इसे समझने के लिए इसे आप हॉलीवुड की "अवतार "फिल्म में दर्शाये गए स्थानीय आदिवासियों के उनके रहवास से सम्बन्ध से तुलना कर सकते हैं। यह कुछ कुछ वैसा ही है।  इसी गहन सम्बन्ध के कारण वहाँ के आदिवासियों ने आज तक उस क्षेत्र में खनन की इजाज़त नहीं दी। यदि किसी विभाग से यह इजाज़त लेनी होती तो शायद थोड़ी सी ही कवायद से यह प्राप्त हो जाती। यह कहानी बहुत सुंदरता के साथ इस बात की द्योतक है कि जनता का अपने रहवास से अंतरंग सम्बन्ध किस तरह पूरे भूदृश्य की रक्षा करने में जनता को सक्षम बनाता है। 

6. वन प्रबन्धन में आग का उपयोग 

सभी आदिवासी समुदायों में वनों के प्रबंधन की पद्धतियों में आग के प्रयोग का विशेष स्थान है या था। उत्तर पूर्व के क्षेत्र और ओडिशा और आंध्र के पूर्वी घात क्षेत्रों में साथ ही देश की कई अन्य इलाकों में आदिवासी समुदाय झूम या पोदु पद्धति की खेती करते थे जिसमें आग का प्रयोग होता था।  ध्यान रहे की ये क्षेत्र आम तौर पर अधिक बारिश बारिश वाले क्षेत्र हैं। यहाँ पेड़ों की अच्छी और तेज़ वृद्धि के लिए जाने जाते हैं। आधुनिक और औपनिवेशिक प्रबंधन ने पूरी एक सदी इस पद्धति का मखौल उड़ाया पर अब नए शोध ने इन पद्धतियों को किसी और प्रबंधन से बेहतर पाया है, खास तौर से जैव विविधता के पुनः स्थापन के लिए। लो इंटेंसिटी या हलकी आग के प्रयोग से आदिवासी समाज अनचाहे पौधों की  देते थे  और जंगल के मैदान आक्रामक झाड़ियों के प्रभाव  रहते थे। डॉ. भारत सुंदरम, जिनका साक्षात्कार हमने कुछ साल पहले इस ब्लॉग में डाला था, उनका पूरा शोध इसी दिशा में है कि कैसे सोलिगा आदिवासी बिलिगिरि पहाड़ियों में आग के मद्धिम प्रयोग से जैव विविधता के संतुलन को बनाये रखते थे।  (https://mainkabir.blogspot.com/2019/10/blog-post.html)

इसके अलावा जो शोध देखने लायक है, वह है डॉ अमलेंदु ज्योतिषी का पोदु पर किया शोध जो ओडिशा के कोरापुट के आदिवासियों के साथ किया है (पढ़िए, इकोलॉजिकल, इकनोमिक एंड इंस्टीटूशनल आस्पेक्ट्स ऑफ़ शिफ्टिंग एग्रीकल्चर: अ स्टडी इन उड़ीसा) .  डॉ ज्योतिषी के अनुसार पोदु पद्धति (शिफ्टिंग एग्रीकल्चर) आजीविका और जैव विविधता की दृष्टि से आधुनिक कृषि के मुक़ाबले ज्यादा असरदार है। उनका कहना है कि यदि पोदु की प्राकृतिक प्रक्रिया पर अमल किया जाए तो यह पारस्थितिकी के लिए बिलकुल नुकसानदेह नहीं है। बल्कि आजीविका, कृषि और  विविधता के लिहाज़ से ऊँचाई पर खेती करने वाले समाजों के लिए एक बेहतर व्यवस्था है। पर पिछले 200 सालों के आधुनिक ज्ञान की धुंध में यह  पूरा ज्ञान भी ढक गया है। 

आखिर में..

मैं यह नहीं कहना चाहता कि जो कुछ भी  पहले होता था, उसे वैसे का वैसा फिर से सृजित कर देना चाहिए। बल्कि शायद ऐसा कुछ करना चाहिए कि इस ज्ञान को भारतीय आवश्यकताओं के सन्दर्भ में फिर से समझने का प्रयास हो। बिना समझे इसे ख़ारिज कर देने से कुछ हासिल नहीं होगा। दोनों ज्ञान व्यवस्थाओं के बीच में संवाद होने से पहले दोनों व्यवस्थाओं की व्यापक समझ होना आवश्यक है। मुझे उम्मीद दिखती है सोशल इकोलॉजी (सामाजिक पारिस्थितिकी) जैसे इंटरडिसिप्लिनरी (अंतर विषयक अध्ययन ) में। हमारे देश के मुताबिक वन प्रबंधन व्यवस्था के लिए हमें सिर्फ वानिकी के सतही विज्ञानं का नहीं बल्कि मानव शास्त्र, वनाधारित अर्थव्यवस्था ऐसे कई विषयों से मिलने वाले ज्ञान को इकठ्ठा करने की आवश्यकता है। 




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  (Acknowledgements: Dhwani Lalai, Keertan Baghel, Ramkumar, Dheeresh, Umesh and Rajesh of Foundation for Ecological Security in 2019-20) For decades, “participation” has been one of the most overused—and least understood—words in development. From large donor programmes to grassroots NGOs, everyone claims to involve the community. But does participation really empower people? Or has it become a comfortable ritual that leaves deeper structures untouched? Mahatma Gandhi: Google images Paulo Friere: from shutterstock To answer this, it helps to return to two thinkers who shaped the idea long before it became a development buzzword. Mahatma Gandhi imagined the what of a true democracy—self-governed, self-reliant communities shaping their own futures. Paulo Freire offered the how —dialogue, critical awareness and the courage to question oppression. When put together, they point toward a participatory approach that is not just about including people in projects, but about enabling t...

क्या हम लकड़ी और चूल्हे को कभी अलग कर पाएंगे?- ग्रामीण भारत की ऊर्जा सुरक्षा और नीतियों का अंतर्विरोध

2005 का एक किस्सा आज याद आ रहा है। मैंने ग्रामीण विकास के क्षेत्र में काम करना शुरू ही किया था।  मैं उत्तराखंड के नैनीताल ज़िले के  मशहूर फल पट्टी क्षेत्र, रामगढ के छोटे से गाँव छतोला में एक संस्था में काम रहा था। संस्था ने एक घर अपने कर्मचारियों के लिए किराये पर ले रखा था। लिहाज़ा, मुझे भी उस घर में रहने का मौका मिला।  एक दिन जिस घर में मैं रहता था उसमें सुबह सुबह एक महिला आयी और उसके दालान में लगे पेड़ से कुछ टहनियां काटने लगी। हमारे पर्यावरणवादी और प्रकृति प्रेमी साथी यह देखकर बहुत आहत हुए और उन्होंने उसे ऐसा करने से रोका। विरोध करने पर वो महिला अपने पतली दुबली काया समेत उस पेड़ से  नीचे उत्तरी और हमें बुरा भला कहते हुए चल दी। वो बात, वह किस्सा हमेशा मेरे मन में कहीं दबा रह गया है। वह महिला अपने घर से इतनी दूर कुछ लकड़ियों के लिए आयी थी। क्या ऐसा मान लेना सही है? क्या उसके पास सुबह सुबह ये काम करने के अलावा और कोई काम नहीं था? क्या दबाव था उसके ऊपर जो उसने ये फसाद मोल लिया। उसको भी पता होगा की ये संस्था वाले उसे रोकेंगे। फिर भी वह वहां आयी। आखिर क्यों?  जब मैं मंड...

क्या लोगों की भागीदारी से सच में सोच बदलती है?

  एक गाँव के छोटे से प्रयोग ने क्या दिखाया** (ध्वनि, धीरेश, सुहास, कीर्तन, राजेश, उमेश, रामकुमार और FES की बिछिया टीम को 2019 में किये इस प्रयोग के लिए आभार) विकास की दुनिया में “भागीदारी” शब्द बहुत चलता है। हर संस्था कहती है कि वे लोगों को साथ लेकर काम करती हैं । लेकिन क्या सच में लोगों की भागीदारी से उनकी सोच और हालात बदलते हैं? या यह बस एक औपचारिक तरीका बन गया है, जिसमें असली समस्याएँ वही की वही रहती हैं? इस सवाल को समझने के लिए दो बड़े विचारकों को याद करना जरूरी है—गांधी और पाउलो फ्रेरे। गांधी ने ऐसे समाज की कल्पना की थी जहाँ लोग खुद अपने फैसले लें। उन्होंने इस तरह भागीदारी के "क्या" का उत्तर देने का प्रयास किया। जबकि फ्रेरे ने बताया कि यह "कैसे" होगा—बातचीत करके साथ में सीखने  से, मुद्दों की पैनी समझ बढ़ाने से और सही सवाल पूछने से जिससे शोषक  व्यवस्था  में सुधार किया जा सके । ये दोनों मिलकर बताते हैं कि असली भागीदारी सिर्फ बैठकों में लोगों को बुलाने से ज्यादा है। यह लोगों को यह समझने का मौका देती है कि उनके जीवन पर कौन-सी ताकतें असर डाल रही हैं। पाउलो फ्रेरे...