Skip to main content

क्या हम लकड़ी और चूल्हे को कभी अलग कर पाएंगे?- ग्रामीण भारत की ऊर्जा सुरक्षा और नीतियों का अंतर्विरोध


2005 का एक किस्सा आज याद आ रहा है। मैंने ग्रामीण विकास के क्षेत्र में काम करना शुरू ही किया था।  मैं उत्तराखंड के नैनीताल ज़िले के  मशहूर फल पट्टी क्षेत्र, रामगढ के छोटे से गाँव छतोला में एक संस्था में काम रहा था। संस्था ने एक घर अपने कर्मचारियों के लिए किराये पर ले रखा था। लिहाज़ा, मुझे भी उस घर में रहने का मौका मिला।  एक दिन जिस घर में मैं रहता था उसमें सुबह सुबह एक महिला आयी और उसके दालान में लगे पेड़ से कुछ टहनियां काटने लगी। हमारे पर्यावरणवादी और प्रकृति प्रेमी साथी यह देखकर बहुत आहत हुए और उन्होंने उसे ऐसा करने से रोका। विरोध करने पर वो महिला अपने पतली दुबली काया समेत उस पेड़ से  नीचे उत्तरी और हमें बुरा भला कहते हुए चल दी। वो बात, वह किस्सा हमेशा मेरे मन में कहीं दबा रह गया है। वह महिला अपने घर से इतनी दूर कुछ लकड़ियों के लिए आयी थी। क्या ऐसा मान लेना सही है? क्या उसके पास सुबह सुबह ये काम करने के अलावा और कोई काम नहीं था? क्या दबाव था उसके ऊपर जो उसने ये फसाद मोल लिया। उसको भी पता होगा की ये संस्था वाले उसे रोकेंगे। फिर भी वह वहां आयी। आखिर क्यों? 

जब मैं मंडला में काम करता था तो रोज़ सुबह सैर को जाते वक़्त अपने सर पर लकड़ी का बोझा ढोती महिलाओं को देखता था। थोड़े बहुत पुरुष भी होते थे जोकि चिरी हुयी लकड़ी लेकर आते दीखते थे, दो गट्ठरों में। पर महिलाएं अधिकतर सिरबोझ ढोती थी। शायद साल के बारह महीने में से आठ महीने तक। ये मैं 2010 से 2020 के 10 सालों की बात कर रहा हूँ। उज्ज्वला योजना, बायोगैस, धुआं रहित चूल्हा या ऐसे किसी भी प्रयास के इतर मैंने कभी भी उन लकड़ी ले जाती महिलाओं की संख्या में कमी आती नहीं देखी। शायद आज भी ऐसी महिलाओं की संख्या कम नहीं हुयी है।  तो क्या हुआ इन प्रयासों का? क्या ये प्रयास एक सीमित तौर पर ही सही, पर सफल कहे जा सकते हैं? मैंने कुछ आंकड़ों को देखने की कोशिश की जो कि नीचे दिए गए हैं। 

भारत में ईंधन की लकड़ी पर निर्भरता: विभिन्न सर्वेक्षणों की तुलना

सर्वेक्षण का नामसंस्था / संगठनमुख्य माप (Metric)ईंधन की लकड़ी/ठोस ईंधन का उपयोग (%)अनुमानित प्रभावित जनसंख्या
HCES (2022-23)NSSO (सांख्यिकी मंत्रालय)उपभोग: वे परिवार जो लकड़ी पर खर्च करते हैं या उसे इकट्ठा करते हैं।37% (राष्ट्रीय)~52 करोड़
NFHS-5 (2021)IIPS (स्वास्थ्य मंत्रालय)प्राथमिक ईंधन: वे परिवार जो लकड़ी को अपना मुख्य ईंधन बताते हैं।41% (राष्ट्रीय)~58 करोड़
IRES (2024-25)CEEW (स्वतंत्र संस्था)फ्यूल स्टैकिंग: लकड़ी का कुल उपयोग (गैस के साथ या बिना)।54% (राष्ट्रीय)~75 करोड़
NFHS-6 (2024-26)IIPS (स्वास्थ्य मंत्रालय)अनुमानित रुझान: वर्तमान प्राथमिक निर्भरता का अनुमान।~35-38% (राष्ट्रीय)~50-53 करोड़

मैंने यह भी जानने की कोशिश की कि क्या पिछले 30 सालों में यह संख्या में कमी आयी। तो पता चला की मोटा मोटी यह संख्या पहले जितनी ही है हालाँकि जनसँख्या के प्रतिशत के रूप में इसमें कमी आयी है।  90 के दशक में देश की 65 % जनसँख्या लकड़ी पर निर्भर थी। अब ये संख्या 35-38 % है। पर संख्या अभी भी 50 करोड़ से ऊपर बानी हुयी है। बल्कि यदि गैस और लकड़ी, दोनों का इस्तेमाल लकरने वाले घरों को जोड़ लिया जाए तो ये 75 करोड़ भी हो सकती है। 

अब इसी संख्या को ईरान-अमेरिका इजराइल युद्ध के परिपेक्ष्य में देखिये।  क्या कोई कह सकता है लोगों की लकड़ी पर निर्भरता आने वाले समय में कम होने वाली है? गैस के बढ़ते दामों के कारण हम कुछ ही महीनो में करोड़ो लोगों को गैस से वापस लकड़ी पर आते देखेंगे और ऐसा शहर और गाँव दोनों जगह होगा। हम आधुनिकता और तकनीकी  प्रगति के चक्कर में यह भूल जाते हैं कि वह असल में वैश्विक सप्लाई चेन और स्रोतों की उपलब्धता पर निर्भर है। इससे उपजे हल स्थायी उपाय नहीं बन पाते। 

हम गैस उपयोग कराने के सब्जबाग दिखा सकते हैं पर अब भी हमारे पास उन 50 -55 करोड़ लोगों के लिए कोई योजना नहीं है जो लकड़ी पर निर्भर हैं। हमारे जंगलों का प्रबंधन उनकी ज़रूरतों के बारे में तो सोचता ही नहीं। हमारे जंगल आक्रामक झाड़ियों, या ऐसे पेड़ों से भरे हुए हैं जिनकी लकड़ी जलावन में या तो इस्तेमाल नहीं की जाती या फिर वह कीमती है और उसे काटा नहीं जा सकता। नतीजा यह है कि हम अपनी नीतियों से ऐसे लोगों का जीना और मुश्किल बनाये जा रहे हैं। उन्ही महिलाओं को जिनके भले के लिए यह योजनाएं लायी जा रही थी, असल में शायद अब पहले से ज़्यादा म्हणत कर रही होंगी जलावन की लकड़ी इकट्ठी करने में। 

इतना ही नहीं। हमारी औपनिवेशिक पर्यावरणीय सोच का नतीजा यह भी है कि यह महिलाएं हम में से बहुत को अपराधी नज़र आती हैं। ऊपर से तो हम महिलाओं को जंगल का संरक्षक कहते हैं पर परिवार के लिए लकड़ी लाने भर से वह जंगल की दुश्मन हो जाती हैं। आम तौर पर जलावन की लकड़ी सूखी ही बेहतर होती है। यह बात सब जानते हैं।  सूखी और गिरी पड़ी लकड़ियों को उठा कर जंगल में आग का खतरा कम होता है। जब  वन क्षेत्रों में लोगों का आना जाना कम होता है, वहां यह लकड़ियां ईंधन की तरह इकट्ठी होती रहती हैं और मौसमी परिवर्तन के समय बड़ी तेज़ी से भयानक दावानल का कारण बनती हैं। 

 लकड़ी इकठ्ठा करने वाले परिवारों पर लकड़ी का इस्तेमाल न करने का दवाब बनाने से एक नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। लकड़ी इकठ्ठा करते समय महिला-पुरुष पकडे जाने के डर के कारण जल्दीबाजी में जंगल को ज़्यादा नुक्सान पहुंचा सकते हैं। जो अन्यथा वह शायद नहीं पहुंचाते। यदि उनके मन में डर न हो तो शायद वह उसी लकड़ी को ले जाएँ जिसकी ज़रुरत है या सूखी लकड़ी को इकठ्ठा करने का काम इत्मीनान से कर पाएं। 

भारत में आक्रामक झाड़ियों के बढ़ते असर से (जोकि औपनिवेशिक वानिकी की एक और नकारात्मक सौगात है ) जो नुक्सान हो रहा है, उसमें भी ये बहुत ज़रूरी है कि लोग आक्रामक झाड़ियों और प्रजातियों का कोई बड़ा उपयोग ढूंढ लें जिससे इनसे होने वाले नुक्सान को कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।  मैंने देखा है कि मध्य प्रदेश के मंडला में लैंटाना एक प्रमुख जलावन की लकड़ी का स्रोत बन चुका है।  ऐसे ही विलायती बबूल (प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा) राजस्थान और गुजरात में चारकोल बनाने के काम में लिया जा रहा है। ये सब बदलाव समुदायों की सहज बुद्धि से हमें प्राप्त हुए न कि औपनिवेशिक वानिकी से। इसी तरह लोग जानते हैं कि कौनसे पेड़ पौधों की लकड़ी जलावन के लिए बेहतर होती है। समुदाय पारम्परिक रूप से ऐसे पेड़ों की पहचान कर के उनका संरक्षण करते रहे हैं। पर औपनिवेशिक वानिकी ऐसे पेड़ों के बजाय इमरती लकड़ी वाले पेड़ों को ही ज्यादा तरजीह देती रही है।  अभी भी सरकारी  नर्सरी में सबसे ज़्यादा सागौन, शीशम या अन्य  ऐसे इमरती लकड़ी देने वाले पेड़ ज्यादा होंगे। अपने प्लांटेशन को लोगों की भागीदारी के बिना करने के कारण उनमें एक बड़ी चिंता होती है कि गाँव के लोग उनके पौधों को मवेशियों को चरा देंगे। तो वो ऐसे पौधे लगते हैं जिनको न मवेशी चारा सकें न ही वो अच्छी जलावन की लकड़ी दे सकें।  उदाहरण के लिया मध्य प्रदेश में करंज के, पलाश के पेड़ बहुत लगेंगे  या फिर पहाड़ में सुरई के पेड़ भी बहुत लगेंगे जिनकी लकड़ी जलावन के लिए बिलकुल अच्छी नहीं मानी जाती और बहुत धुआं देती है। 

एक और गौर करने लायक बात है समुदायों के द्वारा लकड़ी इकठ्ठा करने के लिए प्रयोग में लाये जाने वाले औजार। लकड़ी या चारा इकठ्ठा करने की प्रक्रिया में महिलाएं आम तौर पर एक हंसिया लेकर जाती हैं। इमारती लकड़ी के लिए पुरुष आमतौर पर कुल्हाड़ी लेकर जाते हैं।  आपने आरी या बिजली से चलने वाली चैनसॉ ले जाते किसी स्थानीय व्यक्ति को देखा है? वह माफिया का औजार होता है, लोगों का नहीं।

असली समाधान 'ऊपर से थोपी गई' वैश्विक सप्लाई चेन वाली गैस में नहीं, बल्कि स्थानीय संसाधनों के सम्मान और विकेंद्रीकृत ऊर्जा में छिपा है। जब तक हम ग्रामीण महिला को 'जंगल का दुश्मन' मानने के बजाय उसे 'ऊर्जा प्रबंधक' के रूप में स्वीकार नहीं करते, तब तक छतोला से मंडला तक का यह सिरबोझ यूँ ही बना रहेगा और शायद बढ़ता भी रहेगा।

Comments

  1. I really liked reading this!

    It reminds me of a conversation with the family I'm living with in HP just a coupoe of days ago. I had been feeling very conflicted about the narrative I was hearing about how people worked hard in the past, and now they have become lazy (this was being told me in the context of increasing dependnence on tapped water, rather than filling water from handpumps or natural water sources) and about decline in agriculture. But the flip side of this coin that had been eating me up was that most of this work was contingent on women's labour which has always been invisibilized and unvalued. So I decided to pose this question to them. And although we weren't particularly talking about LPG or chulha then, that's the example they pointed out in the context of the ongoing war. They said that although they do use the LPG stove, they haven't stopped using the chulha too - it provides them with security in times of crises like these.

    Like you mention in your blog, I think the answers to these tensions lie somewhere between recognizing the rights & knowledge of people who have a generational & everyday connection with forests, and in the valuing & visibilizing their work (both care work & sustenance work).

    ReplyDelete
  2. We are entering an age which will make us even more vulnerable for such crises. This is now, the new normal. We better use all knowledge systems if we want to survive..Inherent logic of gender equity is not just justice but also survival..modern value relegate physical labor as a bane but I believe acknowledging it and sharing it between men and women as well as in society is the need of the hour..

    ReplyDelete
  3. हमारे सांझा मित्र हृदयेश जोशी जी की सिफारिश से मैं आपके ब्लॉग पर आया हूँ। आपने जो वास्तविकता है, उसे उजागर किया है। हम एक ओढ़ी हुई ज़िंदगी जी रहे हैं जो हमारी सही स्थिति को नहीं दर्शाती। हम उन 60 करोड़ की आबादी को नहीं देखते जो केवल प्रकृति के भरोसे जी रहे हैं। क्या विकास, क्या आधुनिकता? सचमें पूरी तरह शायद वापस न जा पाएं लेकिन एक हद्द तक तो वापस जाना ही पड़ेगा - कम-से-कम उस ज़माने में जब हमारे दादा-परदादा जी रहे थे। इसके सिवा हम पर्यावरण के संकट से नहीं बच सकते। बल्कि इन्हीं महिलाओं को, जिसका आपने शुरु में ज़िक्र किया है, हम अपराधी घोषित करते रहेंगे।
    दूसरा भागीदारी वाला लेख भी पढ़ा। आपने सही निष्कर्ष निकाला है।

    ReplyDelete
  4. हाल ही में मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले में एक बड़े उद्योगपति को कोयला खनन के लिए हसदेव अरण्य क्षेत्र के पास का जंगल दिया गया था जिसे लेकर बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं। इस क्षेत्र में लगभग 10,000 एकड़ के जंगल और इसमें मौजूद लाखों पेड़ों को काटने का आरोप सरकार पर लगा है, जो मुख्य रूप से आदिवासियों की आजीविका का साधन है।
    हम उन लोगों पर ही दवाब बनाते है जो गरीब है जो सदियों से जंगलों पर रहते रहे है । ओर उनकी सुरक्षा भी उन्हीं के द्वारा ही किया जा रहा था । उनका प्रबंधन व जो समाज ने नियम बनाए । वह कारगर थे ।लिखित मै न सही पर समाज ओर गांव उन नियमों का पालन करते थे । उस समय न ही पर्यावरण को नुकसान होता था ।और न ही गांव को परन्तु आज के समय मै सरकार बड़े बड़े उद्योग पतियों को हजारों एकड़ जंगल दे दिया जाता । उस समय क्या यह सोच मै नहीं होता होगा कि बहा रहने वाले लोगों का क्या होगा ? बहा रहने वाले जीव जंतु का क्या होगा ? मेरे कानों मै अक्सर यह बात सुनाई देती है कि आदिवासी समाज जंगलों का दोहन अधिक मात्रा मै कर रहा है या करते है । उस वक्त उन सभी लोगों को पर्यावरण और ग्लोबल वार्मिंग, भू जल का कम होना । सब कुछ याद आने लगता है । तो क्या यही समाज,ओर गांव के लोगों दोषी ठहराया जाएगा । या फिर विकास के नाम पर बड़े बड़े उद्योग पतियों को जो अपने फायदे के लिए हजारों एकड़ जंगलों को काट देते है ?

    ReplyDelete
  5. Good read. Another factor behind using bio mass is the peculiar taste of food mostly Roti which probably get through chulha only. I have seen affluent natives of haryana having fancy cars in their porch and yet eating food straight out of chulha. And anything which has a strong connection with gastronomy can not be dismissed.

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

Do Participatory Approaches Spark Critical Consciousness? Inside a Village Experiment That Reveals What Development Often Misses**

  (Acknowledgements: Dhwani Lalai, Keertan Baghel, Ramkumar, Dheeresh, Umesh and Rajesh of Foundation for Ecological Security in 2019-20) For decades, “participation” has been one of the most overused—and least understood—words in development. From large donor programmes to grassroots NGOs, everyone claims to involve the community. But does participation really empower people? Or has it become a comfortable ritual that leaves deeper structures untouched? Mahatma Gandhi: Google images Paulo Friere: from shutterstock To answer this, it helps to return to two thinkers who shaped the idea long before it became a development buzzword. Mahatma Gandhi imagined the what of a true democracy—self-governed, self-reliant communities shaping their own futures. Paulo Freire offered the how —dialogue, critical awareness and the courage to question oppression. When put together, they point toward a participatory approach that is not just about including people in projects, but about enabling t...

क्या लोगों की भागीदारी से सच में सोच बदलती है?

  एक गाँव के छोटे से प्रयोग ने क्या दिखाया** (ध्वनि, धीरेश, सुहास, कीर्तन, राजेश, उमेश, रामकुमार और FES की बिछिया टीम को 2019 में किये इस प्रयोग के लिए आभार) विकास की दुनिया में “भागीदारी” शब्द बहुत चलता है। हर संस्था कहती है कि वे लोगों को साथ लेकर काम करती हैं । लेकिन क्या सच में लोगों की भागीदारी से उनकी सोच और हालात बदलते हैं? या यह बस एक औपचारिक तरीका बन गया है, जिसमें असली समस्याएँ वही की वही रहती हैं? इस सवाल को समझने के लिए दो बड़े विचारकों को याद करना जरूरी है—गांधी और पाउलो फ्रेरे। गांधी ने ऐसे समाज की कल्पना की थी जहाँ लोग खुद अपने फैसले लें। उन्होंने इस तरह भागीदारी के "क्या" का उत्तर देने का प्रयास किया। जबकि फ्रेरे ने बताया कि यह "कैसे" होगा—बातचीत करके साथ में सीखने  से, मुद्दों की पैनी समझ बढ़ाने से और सही सवाल पूछने से जिससे शोषक  व्यवस्था  में सुधार किया जा सके । ये दोनों मिलकर बताते हैं कि असली भागीदारी सिर्फ बैठकों में लोगों को बुलाने से ज्यादा है। यह लोगों को यह समझने का मौका देती है कि उनके जीवन पर कौन-सी ताकतें असर डाल रही हैं। पाउलो फ्रेरे...

हिरन और उसका जंगल

           उन्नीस्वी सदी के इंग्लैंड में जब सामुदायिक जमीनों पर बाड़ा बंदी हो रही थी और उन्हें निजी स्वामित्व में सौंपा जा रहा था, उस वक़्त, इंग्लैंड के लोककवियों  ने कॉमन्स पर कई गीत रचे।  "The Goose and the Common" ऐसी ही एक कालजयी रचना है।   कबीर के  दोहों की तरह इस कविता पर भी सबका हक़ है।              The Goose and the Common The law locks up the man or woman.                                                                               Who steals the goose from off the common But leaves the greater villain loose Who steals the common from the goose. The law demands that we atone When we take things we do not own But leaves the lords and ladies fine Who take things that are yours and mine. The p...